Hanuman ji aliganj (new temple)

You may see Aliganj Hanuman ji temple near neera nursing home kapoorthala, this is a very famous Hanuman ji temple. Any one who is spiritually inclined must visit this place of Hanuman ji.  There is a story associated with Aliganj (new temple) ,Lucknow .

as per a story which is famous here it is that in those old days When lord Ram was on earth in human form Gomti river used to flow from this place. Sita ji was exhiled from kingdom of Ayodhya Laxman ji and hanuman ji were accompanying Sita ji to Bithur ashram of sage valmiki while moving out of boundaries of Ayodhya they had rested at this place. Laxman ji had requested to Sita ji to visit next stoppage which was police station of Ayodhya kingdom in the outer areas. However Sitaji was exhiled and she was not willing to go in boundaries of Ayodhya kingdom. Hence Laxman ji went on further but Sita ji had stayed at this place. Lord Hanuman guarded the place. Next day the went to Kanpur Bithur ashram of sage valmiki. Later on a temple was constructed at this place. This temple existed for centuries. The near by area came to be known as Hanuman bari . Later on in 14th century with invasion of Bakhtiyar Khilji name of this place was changed to Islambari.

During 1792-1802 wife of the then nawab of lucknow (awadh province in those days) Rabiya Begum did not had child for many years. Later on Rabiya begum had tried all sort of traditional medicines, prayers , duas etc prevalent in those days how ever nothing worked. One day some one suggested her to go to Islambari and make a dua (supplication) for herself so Rabiya begum went and made supplication then one night she had a dream where her unborn child told her in dream that in that area Islambari, an idol of Hanuman ji is underground some where. If she can dig the ground and manage to excavate ground and get the idol she should establish Hanuman ji temple at that place. Rabiya begum as being guided in dream excavated the ground at that place and found the idol she brought the idol up cleaned it and it was decorated.Servants of Nawab seated the idol on an elephant and they were moving from this place to some location where they can establish the temple of Hanuman ji . It is said that while moving from this place in Aliganj the elephant could not walk further . The idol with all the decoration and frame was kept on ground the elephant stood up but when the idol was again kept on elephants back the elephant could not walk again.Later on a sadhu (sage) of islam bari said to queen that probably Hanuman ji does not want to go further because that area (adjacent to river Gomti. ) is of Laxman ji . Geographic location of Gomti river in those days was near this place but later on the course of flow had changed this is as per the stories prevalent in area. Hence the Rabia begum (queen of nawab Mohammad Ali Shah got a temple constructed at current place and appointed the sadhu an official priest at expense of Nawab of Awadh. For the construction of Hanuman temple land was given from Mahmoodabad state near by for free and that sadhu who had suggested hanuman ji does not want to move further was appointed priest there.

There are some other stories also famous at this place shall update them here.

The idol is an old one and it is said that Hanuman ji had given dream to someone in those days and this idol was extracted from ground. Later on as per Hanuman ji wish this idol was being carried on an elephant and the elephant stopped at this place where the current idol as shown in image is present. That is how this current idol got established at its place.

Another story is there about this temple which says once grandmother of Nawab Wajid Ali shah  became sick. Name of grandmother Aliya begum.She became sick and she had made a supplication she became allright from that time here a fair is conducted in hindu lunar calendar of Jyestha. This month usually falls in June-July.

Also another story is famous that once plague had spread in this area and people became alright when the came to shelter of hanuman ji and then a local fair has been conducted since then every year.

How to reach: Visit Charbagh Railway Station Lucknow from there bus number 33C goes to Kapoorthala. Get down at Kapoorthala and from there it is at walking distance. It is an age old  place of worship. pic1

You may copy the image and redistribute it to your friends relatives any one who is willing to worship Hanuman ji. Here is a link to Google maps to make you clearly understand location
1) https://goo.gl/maps/CC9Jx4MGxn92

2) https://www.google.co.in/maps/dir/Charbagh+Railway+Station+Bus+Stop,+National+Highway+25,+Cash+and+Pay+Colony,+Charbagh,+Lucknow,+Uttar+Pradesh/New+Hanuman+Mandir,+C-8,+Shivani+Plaza,+Near+ITI+Chauraha,+Aliganj,+Mahanagar+Extension,+Shadab+Colony,+Mahanagar,+Lucknow,+Uttar+Pradesh+226024/@26.8581072,80.9065472,13z/data=!3m1!4b1!4m13!4m12!1m5!1m1!1s0x399bfc4c900d1197:0x88d53e1e9f3df700!2m2!1d80.927031!2d26.8327065!1m5!1m1!1s0x399957d6195e25bb:0xa9b147a1af2a7a5f!2m2!1d80.94947!2d26.88342

राम वंशावली

*कभी सोचा है की प्रभु श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?*

*नहीं तो जानिय…

*1 -* ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,

*2 -* मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,

*3 -*कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,

*4 -*विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,

*5 -* वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |

*6 -*इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,

*7 -*कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,

*8 -*विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,

*9 -*बाण के पुत्र अनरण्य हुए,

*10-* अनरण्य से पृथु हुए,

*11-* पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,

*12-* त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,

*13-*धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,

*14-*युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,

*15-* मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,

*16-*सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,

*17-*ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,

*18-*भरत के पुत्र असित हुए,

*19-*असित के पुत्र सगर हुए,

*20-* सगर के पुत्र का नाम असमंज था,

*21-*असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,

*22-*अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,

*23-*दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |

*24-*ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |

*25-*रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,

*26-*प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,

*27-*शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,

*28-* सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,

*29-*अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,

*30-*शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,

*31-*मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,

*32-*प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,

*33-*अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,

*34-*नहुष के पुत्र ययाति हुए,

*35-*ययाति के पुत्र नाभाग हुए,

*36-*नाभाग के पुत्र का नाम अज था,

*37-* अज के पुत्र दशरथ हुए,

*38-* दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |

इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी *(39)*पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ | शेयर करे ताकि हर हिंदू इस जानकारी को जाने..
*रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य*
*1:~*मानस में राम शब्द = 1443 बार आया है।

*2:~*मानस में सीता शब्द = 147 बार आया है।

*3:~*मानस में जानकी शब्द = 69 बार आया है।

*4:~*मानस में बैदेही शब्द = 51 बार आया है।

*5:~*मानस में बड़भागी शब्द = 58 बार आया है।

*6:~*मानस में कोटि शब्द = 125 बार आया है।

*7:~*मानस में एक बार शब्द = 18 बार आया है।

*8:~*मानस में मन्दिर शब्द = 35 बार आया है।

*9:~*मानस में मरम शब्द = 40 बार आया है।
*10:~*लंका में राम जी = 111 दिन रहे।

*11:~*लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं।

*12:~*मानस में श्लोक संख्या = 27 है।

*13:~*मानस में चोपाई संख्या = 4608 है।

*14:~*मानस में दोहा संख्या = 1074 है।

*15:~*मानस में सोरठा संख्या = 207 है।

*16:~*मानस में छन्द संख्या = 86 है।
*17:~*सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का।

*18:~*सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में।

*19:~*मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी।

*20:~*पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी।

*21:~*रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला।

*22:~*राम रावण युद्ध = 32 दिन चला।

*23:~*सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ।
*24:~*नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं।

*25:~*त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं।
*26:~*विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए।

*27:~*राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में।

*28:~*रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।

सन्यासी की कहानी 43

(((((((((( सच्चा सन्यास ))))))))))


एक व्यक्ति प्यास से बेचैन भटक रहा था. उसे गंगाजी दिखाई पड़ी. पानी पीने के लिए नदी की ओर तेजी से भागा लेकिन नदी तट पर पहुंचने से पहले ही बेहोश होकर गिर गया.


थोड़ी देर बाद वहां एक संन्यासी पहुंचे. उन्होंने उसके मुंह पर पानी का छींटा मारा तो वह होश में आया. व्यक्ति ने उनके चरण छू लिए और अपने प्राण बचाने के लिए धन्यवाद करने लगा.


संन्यासी ने कहा- बचाने वाला तो भगवान है. मुझमें इतना सामर्थ्य कहां है ? शक्ति होती तो मेरे सामने बहुत से लोग मरे मैं उन्हें बचा न लेता. मैं तो सिर्फ बचाने का माध्यम बन गया.


इसके बाद संन्यासी चलने को हुए तो व्यक्ति ने कहा कि मैं भी आपके साथ चलूंगा. संन्यासी ने पूछा- तुम कहां तक चलोगे. व्यक्ति बोला- जहां तक आप जाएंगे.


संन्यासी ने कहा मुझे तो खुद पता ही नहीं कि कहां जा रहा हूं और अगला ठिकाना कहां होगा. संन्यासी ने समझाया कि उसकी कोई मंजिल नहीं है लेकिन वह अड़ा रहा. दोनों चल पड़े.


कुछ समय बाद व्यक्ति ने कहा- मन तो कहता है कि आपके साथ ही चलता रहूं लेकिन कुछ टंटा गले में अटका है. वह जान नहीं छोड़ता. आपकी ही तरह भक्तिभाव और तप की इच्छा है पर विवश हूं.


संन्यासी के पूछने पर उसने अपने गले का टंटा बताना शुरू किया. घर में कोई स्त्री और बच्चा नहीं है. एक पैतृक मकान है उसमें पानी का कूप लगा है.


छोटा बागीचा भी है. घर से जाता हूं तो वह सूखने लगता है. पौधों का जीवन कैसे नष्ट करूं. नहीं रहने पर लोग कूप को गंदा करते हैं. नौकर रखवाली नहीं करते, बैल भूखे रहते हैं. बेजुबान जानवर है उसे कष्ट दूं.


बहुत से संगी-साथी हैं जो मेरे नहीं होने से उदास होते हैं, उनके चेहरे की उदासी देखकर उनका मोह भी नहीं छोड़ पाता.


दादा-परदादा ने कुछ लेन-देन कर रखा था. उसकी वसूली भी देखनी है. नहीं तो लोग गबन कर जाएंगे. अपने नगर से भी प्रेम है.


बाहर जाता हूं तो मन उधर खिंचा रहता है. अपने नगर में समय आनंदमय बीत जाता है. लेकिन मैं आपकी तरह संन्यासी बनना चाहता हूं. राह दिखाएं.


संन्यासी ने उसकी बात सुनी फिर मुस्कराने. लगे. उन्होंने कहा- जो तुम कर रहे हो वह जरूरी है. तुम संन्यास की बात मत सोचो. अपना काम करते रहो.


व्यक्ति उनकी बात समझ तो रहा था लेकिन उस पर संन्यासी बनने की धुन भी सवार थी.


चलते-चलते उसका नगर आ गया. उसे घर को देखने की इच्छा हुई. उसने संन्यासी से बड़ी विनती की- महाराज मेरे घर चलें. कम से कम 15 दिन हम घर पर रूकते हैं. सब निपटाकर फिर मैं आपके साथ निकल जाउंगा.


संन्यासी मुस्कुराने लगे और खुशी-खुशी तैयार हो गए. उसकी जिद पर संन्यासी रूक गए और उसे बारीकी से देखने लगे.


सोलहवें दिन अपना सामान समेटा और निकलने के लिए तैयार हो गए. व्यक्ति ने कहा-महाराज अभी थोड़ा काम रहता है. पेड़-पौधों का इंतजाम कर दूं. बस कुछ दिन और रूक जाएं निपटाकर चलता हूं.


संन्यासी ने कहा- तुम हृदय से अच्छे हो लेकिन किसी भी वस्तु से मोह त्यागने को तैयार ही न हो. मेरे साथ चलने से तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता. किसी भी संन्यासी के साथ तुम्हारा भला नहीं हो सकता.


उसने कहा- कोई है ही नहीं तो फिर किसके लिए लोभ-मोह करूं.


संन्यासी बोले- यही तो और चिंता की बात है. समाज को परिवार समझ लो, उसकी सेवा को भक्ति. ईश्वर को प्रतिदिन सब कुछ अर्पित कर देना. तुम्हारा कल्याण हो इसी में हो जाएगा. कुछ और करने की जरूरत नहीं.


वह व्यक्ति उनको कुछ दूर तक छोड़ने आया. विदा होते-होते उसने कहा कि कोई एक उपदेश तो दे दीजिए जो मेरा जीवन बदल दे.


संन्यासी हंसे और बोले- सत्य का साथ देना, धन का मोह न करना. उन्होंने विदा ली.


कुछ साल बाद वह संन्यासी फिर वहां आए. उस व्यक्ति की काफी प्रसिद्धि हो चुकी थी. सभी उसे पक्का और सच्चा मानते थे. लोग उससे परामर्श लेते. छोटे-मोटे विवाद में वह फैसला देता तो सब मानते.उसका चेहरा बताता था कि संतुष्ट और प्रसन्न है.


संन्यासी कई दिन तक वहां ठहरे. फिर एक दिन अचानक तैयार हो गए चलने को.


उस व्यक्ति ने कहा- आप इतनी जल्दी क्यों जाने लगे. आपने तो पूछा भी नहीं कि मैं आपके उपदेश के अनुसार आचरण कर रहा हूं कि नहीं.


संन्यासी ने कहा- मैंने तुम्हें कोई उपदेश दिया ही कहां था ? पिछली बार मैंने देखा कि तुम्हारे अंदर निर्जीवों तक के लिए दया है लेकिन धन का मोह बाधा कर रहा था. वह मोह तुम्हें असत्य की ओर ले जाता था हालांकि तुम्हें ग्लानि भी होती थी.


तुम्हारा हृदय तो सन्यास के लिए ऊर्वर था. बीज पहले से ही पड़े थे, मैंने तो बस बीजों में लग रही घुन के बारे में बता दिया. तुमने घुन हटा दी और फिर चमत्कार हो गया. संन्यास संसार को छोड़कर ही नहीं प्राप्त होता. अवगुणों का त्याग भी संन्यास है.


हम सब में उस व्यक्ति की तरह सदगुण हैं. जरूरत है उन्हें निखारने की. निखारने वाले की. अपने काम करने के तरीके में थोड़ा बदलाव करके आप चमत्कार कर सकते हैं.


एक बदलाव आजमाइए- हर किसी से प्रेम से बोलें. उनसे ज्यादा मीठा बोलेंगे जिन पर आपका शासन है. आपमें जो मधुरता आ जाएगी वह जीवन बदल देगी. कम से कम इसे आजमाकर देखिए.


​नारदजी की जन्म कथा 🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹

नारदजी की जन्म कथा 


देवर्षि नारद पहले गन्धर्व थे। एक बार ब्रह्मा जी की सभा में सभी देवता और गन्धर्व भगवन्नाम का संकीर्तन करने के लिए आए। नारद जी भी अपनी स्त्रियों के साथ उस सभा में गए। भगवान के संकीर्तन में विनोद करते हुए देखकर ब्रह्मा जी ने इन्हें शाप दे दिया। जन्म लेने के बाद ही इनके पिता की मृत्यु हो गई। इनकी माता दासी का कार्य करके इनका भरण-पोषण करने लगीं।
एक दिन गांव में कुछ महात्मा आए और चातुर्मास्य बिताने के लिए वहीं ठहर गए। नारद जी बचपन से ही अत्यंत सुशील थे। वह खेलकूद छोड़ कर उन साधुओं के पास ही बैठे रहते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा भी बड़े मन से करते थे। संत-सभा में जब भगवत्कथा होती थी तो यह तन्मय होकर सुना करते थे। संत लोग इन्हें अपना बचा हुआ भोजन खाने के लिए दे देते थे।
साधुसेवा और सत्संग अमोघ फल प्रदान करने वाला होता है। उसके प्रभाव से नारद जी का हृदय पवित्र हो गया और इनके समस्त पाप धुल गए। जाते समय महात्माओं ने प्रसन्न होकर इन्हें भगवन्नाम का जप एवं भगवान के स्वरूप के ध्यान का उपदेश दिया।
एक दिन सांप के काटने से उनकी माता जी भी इस संसार से चल बसीं। अब नारद जी इस संसार में अकेले रह गए। उस समय इनकी अवस्था मात्र पांच वर्ष की थी। माता के वियोग को भी भगवान का परम अनुग्रह मानकर ये अनाथों के नाथ दीनानाथ का भजन करने के लिए चल पड़े। एक दिन जब नारद जी वन में बैठकर भगवान के स्वरूप का ध्यान कर रहे थे, अचानक इनके हृदय में भगवान प्रकट हो गए और थोड़ी देर तक अपने दिव्य स्वरूप की झलक दिखाकर अन्तर्धान हो गए।
भगवान का दोबारा दर्शन करने के लिए नारद जी के मन में परम व्याकुलता पैदा हो गई। वह बार-बार अपने मन को समेट कर भगवान के ध्यान का प्रयास करने लगे, किंतु सफल नहीं हुए। उसी समय आकाशावाणी हुई, ‘‘अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद रूप में मुझे पुन: प्राप्त करोगे।’’
समय आने पर नारद जी का पांच भौतिक शरीर छूट गया और कल्प के अंत में वह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। देवर्षि नारद भगवान के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। यह भगवान की भक्ति और महात्म्य के विस्तार के लिए अपनी वीणा की मधुर तान पर भगवद् गुणों का गान करते हुए निरंतर विचरण किया करते हैं। इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इनके द्वारा प्रणीत भक्ति सूत्र में भक्ति की बड़ी ही सुंदर व्याख्या है। अब भी यह अप्रत्यक्ष रूप से भक्तों की सहायता करते रहते हैं। भक्त प्रह्लाद, भक्त अम्बरीष, ध्रुव आदि भक्तों को उपदेश देकर इन्होंने ही उन्हें भक्ति मार्ग में प्रवृत्त किया। इनकी समस्त लोकों में अबाधित गति है। इनका मंगलमय जीवन संसार के मंगल के लिए ही है। यह ज्ञान के स्वरूप, विद्या के भंडार, आनंद के सागर तथा सब भूतों के अकारण प्रेमी और विश्व के सहज हितकारी हैं। 
अविरल भक्ति के प्रतीक और ब्रह्मा के मानस पुत्र माने जाने वाले देवर्षि नारद का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक भक्त की पुकार भगवान तक पहुंचाना है। वह विष्णु के महानतम भक्तों में माने जाते हैं और इन्हें अमर होने का वरदान प्राप्त है। भगवान विष्णु की कृपा से यह सभी युगों और तीनों लोगों में कहीं भी प्रकट हो सकते हैं।
     ।।  नारायण नारायण ।।

अयोध्या के दर्शन एवं यात्रा” 

“अयोध्या के दर्शन एवं यात्रा” 
अयोध्या नगरी की यात्रा करने की अभिलाषा मुझे कई बर्षो से थी | अयोध्या नगरी जहाँ भगवान का जन्म हुआ, जहा महाकाव्य रामायण की शुरूवात हुई और जहाँ रामायण का समापन्न भी हुआ | अयोध्या नगरी भारत बर्ष में पैदा हुअ बच्चा-बच्चा जानता हैं 

अयोध्या नगरी विभिन्न रंगो में रंगी नगरी हैं, मानो इस पर रंगो का बौछार हुई हो, हर घर हर आश्रम चटर रंगो में रंगा अयोध्या को सजीव एवं चमकदार रूप प्रदान करता हैं |

यहाँ की संकरी गलिया, साईकल, मोटर और मनुष्यो के क्रियाकलापो से गुंजायमान रहती हैं, सही मायनो में यह एक अनोखा एवं अद्भुत शहर हैं | 
    🌷”सरयू नदी”🌷
सरयू नदी का जल एकदम साफ दिखाई पड़ता हैं, नदी में स्नान कर रहा कोई भी व्यक्ति इसकी तलहटी को एकदम साफ निहार सकता हैं, पर्यटक इस नदी को नौका से पार भी करते हैं, मान्यता के अनुसार सरयू नदी को पार कर के ही श्रीराम वन गये थे, नदी के तट पर केवट प्रसंग का स्मरण हो आना अत्यन्त स्वभाविक हैं | 


🌷”सरयू जी की आरती “🌷
शाम के समय सरयू नदी पर सरयू आरती होती हैं, मैने इससे पहले ऐसी आरती वाराणसी में गंगा की ऐर बटेश्वर में यमुना की देखी थी, नदीयों के घाचो पर संध्या आरती भी 21वी सदी का नवीन अनुष्ठान प्रतीत होता हैं | हजारो की संख्या में नदी में तैरते हुए मिट्टी के दिये, यह एक अत्यन्त ही मनोहर दृश्य होता हैं|
🌻”गुप्तार घाट”🌻
मेरी सरयू जी कि यात्रा गुप्तार घाट से ही आरम्भ हुई | जो फैजाबाद मे सरयू के दुसरे तट पर स्थित हैं |यह एक अनुठा शांत घाट हैं, जिस पर हल्के पिले रंग का एक भव्य मंदिर हैं | यहा से चाट पकौड़े कि दुकानो के बाजु में रंगबिरंगे नावे भी दिखाई दे रही थी | गुप्तार घाट से जुड़ी दंकथा कहती हैं, कि भगवान राम ने सरयू नदी में जलसमाधी हेतु इसी घाट से प्रवेश किये थे |

सरयू नदी का पाट अत्यंत चौड़ा हैं, उस पर लम्बी नौका सवारी का आनन्द लिया जा सकता हैं | हमे नदी किनारे कई पक्षियों केभी दर्शन हुए | जैसे-जैसे हम अयोध्या के तरफ बढ़ रहे थे, हमे अयोध्या के क्षितिजरेखा दिखाई पड़ने लगी |
 🌼”झुनकी घाट”🌼
गुप्तार घाट से अयोध्या जिस घाट पर पहुचे वह था झुनकी घाट, वराणसी के घाटो से कहीं ज्यादा स्वच्छ एवं भव्य, इस पर ताज़ी सफेदी की हुई थी | मेरे गले मे पड़ी चटक गेंदे की माला मुझे इस स्थान का एक अभित्र अंग महसूस करा रही थी|

यह इतना साफ सुथरा और शांत घाट हैं, कि इस पर सैर करने का एक अलग ही अंदाज हैं |
कहाँ जाता हैं कि इसी घाट पर श्रीराम स्नान किया करते थें|

इसी वजह से यहा आज भी लोग स्नान करते हैं | राम घाट के जल से भगवान को स्नान कराते हैं | उसके बाद अयोध्या का दर्शन करते हैं |
🍃”लक्ष्मण घाट”🍃
झुनकी घाट से थोड़ा आगे जाने पर लक्ष्मण घाट पड़ता हैं| इसी घाट से जुड़ी यह मान्यता हैं, कि राम के भ्राता लक्ष्मण ने इसी घाट पर जलसमाधी ली थी |
🌷”श्रीराम जन्मस्थान”🌷
कहाँ जाता हैं श्रीराम जी जन्म इसी स्थान पर पर हुआ था | श्रीराम जन्मस्थान पर आज भी श्रीरामलला का मुर्ति विरजमान हैं, भक्तगण लम्बी-लम्बी कतारो में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था से गुजरकर श्रीरामलला के दर्शन करते हैं |
🌹”कनक भवन”🌹
लोगो का यह मानना हैंकि महाराज दशरथ और कैकयी ने सिता जी को मुँह देखाई रूप में कनक भवन दिये थे | अयोध्या का कनक भवन बेहद विशाल एवं भव्य मंदिर हैं, राम जानकी कि मुर्ति भी श्रद्धालुओं को मोहित कर देती हैं, तथा श्रीराम जानकी की प्रतिमा हर किसी का संताप हर लेती हैं|
“🌺दशरथ जी का राजमहल”🌺
श्री चक्रवर्ती महाराज दशरथ जी का राज महल बहुत प्राचीन एवं भव्य हैं | इसके परिसर में काफी संख्या में जमा होकर श्रद्धालु भजन-किर्तन गाते हैं |
🌿”दशरथ जी का राजदरबार”🌿

महाराज दशरथ जी का राज्य दरबार बेहद खुबशुरत तथा भव्य हैं, इसका परिसर बहुत बड़ा हैं, इसी दरबार में महाराज दशरथ बैंठ कर न्याय का निर्णय लेते थे |
अयोध्या के बीचोंबीच हनुमानगढ़ी मे रामभक्त हनुमान जी का विशाल प्रसिद मंदिर हैं | ऐसी मान्यता हैं कि अयोध्या में सबसे पहले हनुमानगढ़ी मंदिर में बरंगबली का दर्शन कर के आशिर्वाद लेना चाहिए, फिर अन्य मंदिर जाना चाहिए, ऐसा कहा जाता हैं कि जब भगवान श्रीराम ने जीवन त्याग कर सरयू नदी में समाधी लेने का निश्चय किये तब उन्होने हनुमान को बुलावा भेजे, और उन्हे अपनी अयोध्या की सुरक्षा की जिम्दारी सौंपे

 अयोध्या पर नजर रखने के लिए हनुमान एक पहाड़ पर बैठ गए | ऐसा माना जाता हैं कि उसी पहाड़ पर हनुमानगढ़ी बनाया गया हैं |  मंदिर में हनुमान मुर्ति के स्थान पर एक अनियमित आकार का पत्थर रखा हुआ हैं |

आप जब भी हनुमानगढ़ी के दर्शन जाए उसकी छत पर अवश्य जाए, यहा से सम्पूर्ण अयोध्या नगरी के दर्शन किए जा सकते हैं | 
🍃”दन्तधावन कुण्ड”🍃
अयोध्या नगरी के बीचोबींच हनुमान गढ़ी के इलाके में ही एक बड़ा सा कुंड हैं जो दन्तधावन कुंड के नाम से जाना जाता हैं | इसे ही राम दतौंन कहते हैं, कहा जाता है श्रीराम इसी कुंड के जल से सुबह अपने दांतो की सफाई करते थे |
☘”दिगंबर जैन मंदिर”☘
अयोध्या जैमतावलंबियो के लिए पवित्र तीर्थ हैं मान्यता हैं कि जैंन धर्म के प्रथम तीर्थकर  ऋषभदेव का जन्म यही हुआ था |
🌻”श्रीराम मंदिर कार्यशाला”🌻
अयोध्या में प्रस्तावित श्रीराम मंदिर के निमार्ण के लिए एक कार्शाला बनाई गयी हैं, यहा विशाल पत्थरों के स्तम्भो को बेहद खुबशुरती के साथ तरासा या हैं, जिस पर सुन्दर नक्काशी की गयी हैं, लोग इस स्थान को भी देखने आते हैं |

ब्रज भक्तमाल कथा* 

💐🌺 *ब्रज भक्तमाल कथा* 🌺💐
  *भगवत रसिक जी का चरित्र*
       श्री राम गोपाल नाम के एक भक्त थे। वह भगवत रसिक जी से विरक्त वेष लेकर भजन करना चाहते थे। लेकिन उसके अंदर झांक कर *श्री भगवत रसिक जी* बोले – तुम अभी घर पर रहकर ही भजन करो, तेरे तुम्हारे अंदर अभी कुछ वासनाएं शेष है। उन्हें भोगकर हमारे पास आ जाना । गुरु आज्ञा मानकर भजन करने लगा और अंत में भगवत रसिक जी के निकुंज गमन के पश्चात वह ही वही जा पहुंचा ।

 गुरु की आज्ञा मानना ही सर्वश्रेष्ठ भजन है। श्री भगवत रसिक जी की स्थिति बहुत ही उठ चुकी थी। देह गेह के भेद का भान ही नहीं था। जाति तो देह की होती है। रसिक अनन्य की कोई जाति नहीं होती। स्वयं मधुकरी वृति से रहते । एक दिन किसी धोबी के घर से मधुकरी ले आए किसी ईर्ष्यालु ने जाकर गुरु जी से शिकायत कर दी। श्री ललित मोहनी दास जी ने भ्रमवश भगवत रसिक जी को वृंदावन से बाहर जाने की आज्ञा दे दी।

भगवत रसिक जी इस निर्णय से बहुत दुखी हुए लेकिन गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर यमुना जी के किनारे किनारे वृंदावन को हृदय में बसाकर प्रयाग की ओर चल पड़े। उनके साथ कुछ संत भी हो लिए। जिनमें रसरंग जी, बिहारी बल्लभ जी, मोहनदास आदि प्रमुख थे। मार्ग में एक घनघोर जंगल आया जिसमें एक नरभक्षी सिंह रहता था। मोहन दास जी ने यही विश्राम करने की प्रार्थना की। 

भगवत रसिक जी बोले -डरो मत साथ चलो। सिंह आया तो उसे देखकर भगवत रसिक जी ने अपने करुुआ के जल को उसके ऊपर छिड़का और प्रहलाद जी की कथा सुनाकर उसकी सारी विषमता का हरण करके पीपाजी की तरह भक्त बना दिया ।

सिंह शिष्य बन गया। सभी जय जय कर उठे। भगवत रसिक जी संतो के साथ प्रयाग पहुंचे और अड़ैल के समीप यमुना किनारे एक मड़ी में निवास करने लगे। यही भजन भावना में लीन रहते। कुछ संतो से सुना है एक वयोवृद्ध संत भगवत रसिक जी की वाणी की एक प्रति हस्तलिखित वृंदावन आकर श्री ललित मोहनी दास जी को अमूल्य निधि बताकर भेंट कर गए। उसे पढ़ कर अति प्रसन्न हुए लेकिन एक पद “चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नाहि।’ को देखकर संकोच में पड़ गए कि इसका भक्तों में प्रचार करें कि नहीं । अगले दिन प्रात यमुना स्नान करने गए तो ग्रंथ साथ ले गए। स्नान के पश्चात यमुनाजी में ग्रंथ प्रवाहित कर के वापस आ गये। दूसरे दिन स्नान को गए और डुबकी लगा बाहर निकले तो ग्रंथ उनके हाथ में आ गया।

पुनः प्रवाहित कर के वापस आ गए तीसरे दिन पुनः स्नान को पधारें

तो डुबकी लगाते ही ग्रंथ हाथों में आ गया । ग्रंथ का बस्ता रंच मात्र भी भीगा नहीं था ।

 विचार में पड़ गए क्या करें ? उसी समय यमुना जी बोली- इसे साथ ले जाइए इस ग्रंथ के द्वारा रसिक भक्तों का कल्याण होगा। तब श्री ललित मोहनी जी अपने साथ ले आए। जो इस वाणी को पढ़ता सुनता है उसके हृदय में श्यामा श्याम की नित्यकेलि की लीलाएं प्रगट हो जाती हैं ।

जब श्री भगवत रसिक जी निकुंज महल जाने लगे तो गंगा जी प्रगट हो कर बोली – आप शिवलोक चलिए और उसे पवित्र कीजिए। सरस्वती जी कहने लगी – ब्रह्मा जी आपकी राह देख रहे हैं। 

यमुनाजी मुस्कुराती हुई बोली -चलो वृंदावन चले। वही नित्य स्वरूप से श्यामा श्याम जी की सेवा करना। देवता आदि इंद्र के साथ बोले – आप स्वर्ग चलें वहां सुख भोगे। भगवत रसिक जी बोले – स्वर्ग में सुख विनाशी है । इसलिए हे देवताओं! श्यामा श्याम के समीप वृंदावन जाएंगे। वहां हरिदासी नित्य लाड लड़ाती है। उन्ही के चरणों में हमारी आस्था है।

 ऐसा कहकर प्रयाग में ही अपनी नित्य सखी स्वरूप को धारण करके निकुंज महल के निकुंज परिकर में पांच भौतिक शरीर को छोड़कर जा मिले । प्रयाग में ही इनकी समाधि बनी हुई है । इन महापुरुषों का जीवन चरित्र साधक को साधना का मार्ग प्रशस्त करता है । इसलिए सदैव अपने मन को उन महापुरुषों के परम पावन चरित्रों में निमज्जन कराना चाहिए।


🥀🙏🏻 *जय जय श्रीराधे* 🙏🏻🥀

नरसी मेहता 

प्रेरक प्रसंग

“”* भगवान “” और “” भक्त “” …..?
“*नरसी मेहता जी के जीवन की एक घटना आप सभी महानुभावों को समर्पित ।

एक बार नरसी जी का बड़ा भाई वंशीधर नरसी जी के घर आया। पिता जी का वार्षिक श्राद्ध करना था।
वंशीधर ने नरसी जी से कहा :- ‘कल पिताजी का वार्षिक श्राद्ध करना है। कहीं अड्डेबाजी मत करना बहु को लेकर मेरे यहाँ आ जाना। काम-काज में हाथ बटाओगे तो तुम्हारी भाभी को आराम मिलेगा।’
नरसी जी ने कहा :- ‘पूजा पाठ करके ही आ सकूँगा।’ इतना सुनना था कि वंशीधर उखड गए और बोले :- ‘जिन्दगी भर यही सब करते रहना, जिसकी गृहस्थी भिक्षा से चलती है, उसकी सहायता की मुझे जरूरत नहीं है।

तुम पिताजी का श्राद्ध अपने घर पर अपने हिसाब से कर लेना।’
नरसी जी ने कहा :-“नाराज क्यों होते हो भैया ? मेरे पास जो कुछ भी है, मैं उसी से श्राद्ध कर लूँगा।’ दोनों भाईयों के बीच श्राद्ध को लेकर झगडा हो गया है, नागर-मंडली को मालूम हो गया।
नरसी अलग से श्राद्ध करेगा, ये सुनकर नागर मंडली ने बदला लेने की सोची। पुरोहित प्रसन्न राय ने सात सौ ब्राह्मणों को नरसी के यहाँ आयोजित श्राद्ध में आने के लिए आमंत्रित कर दिया।
प्रसन्न राय ये जानते थे कि नरसी का परिवार मांगकर भोजन करता है। वह क्या सात सौ ब्राह्मणों को भोजन कराएगा…? आमंत्रित ब्राह्मण नाराज होकर जायेंगे और तब उसे ज्यातिच्युत कर दिया जाएगा।
अब कहीं से इस षड्यंत्र का पता नरसी मेहता जी की पत्नी मानिकबाई जी को लग गया वह चिंतित हो उठी।
अब दुसरे दिन नरसी जी स्नान के बाद श्राद्ध के लिए घी लेने बाज़ार गए। नरसी जी घी उधार में चाहते थे पर किसी ने उनको घी नहीं दिया।

अंत में एक दुकानदार राजी हो गया पर ये शर्त रख दी कि नरसी को भजन सुनाना पड़ेगा।

बस फिर क्या था, मन पसंद काम और उसके बदले घी मिलेगा, ये तो आनंद हो गया।

अब हुआ ये कि नरसी जी भगवान का भजन सुनाने में इतने तल्लीन हो गए कि ध्यान ही नहीं रहा कि घर में श्राद्ध है।
( मित्रों ये घटना सभी के सामने हुयी है। आज भी कई जगह ऎसी घटनाएं प्रभु करते हैं ऐसा कुछ अनुभव है। ऐसे-ऐसे लोग हुए हैं इस पावन धरा पर। )
तो आईये कथा मे आगे चलते हैं…

अब नरसी मेहता जी गाते गए भजन उधर नरसी के रूप में भगवान कृष्ण श्राद्ध कराते रहे। जयहो प्रभू, दुकानदार के यहाँ नरसी जी भजन गा रहे हैं और वहां श्राद्ध “कृष्ण भगवान” नरसी जी के भेस में करवा रहे हैं।
जय हो, जय हो वाह प्रभू क्या माया है,अद्भुत, भक्त के सम्मान की रक्षा को स्वयं भेस धर लिए। वो कहते हैं ना की :-
“अपना मान भले टल जाए, 

भक्त का मान न टलते देखा…?

प्रबल प्रेम के पाले पड़ कर, 

प्रभु को नियम बदलते देखा ।

अपना मान भले टल जाये, 

भक्त मान नहीं टलते देखा ।।
तो महाराज सात सौ ब्राह्मणों ने छककर भोजन किया। दक्षिणा में एक एक अशर्फी भी प्राप्त की। सात सौ ब्राह्मण आये तो थे नरसी जी का अपमान करने और कहाँ बदले में सुस्वादु भोजन और अशर्फी दक्षिणा के रूप में…

वाह प्रभु धन्य है आप और आपके भक्त।
दुश्त्मति ब्राह्मण सोचते रहे कि ये नरसी जरूर जादू-टोना जानता है। इधर दिन ढले घी लेकर नरसी जी जब घर आये तो देखा कि मानिक्बाई जी भोजन कर रही है। नरसी जी को इस बात का क्षोभ हुआ कि श्राद्ध क्रिया आरम्भ नहीं हुई और पत्नी भोजन करने बैठ गयी।
नरसी जी बोले :- ‘वो आने में ज़रा देर हो गयी। क्या करता, कोई उधार का घी भी नहीं दे रहा था, मगर तुम श्राद्ध के पहले ही भोजन क्यों कर रही हो……..?’
मानिक बाई जी ने कहा :- ‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है…?

स्वयं खड़े होकर तुमने श्राद्ध का सारा कार्य किया। ब्राह्मणों को भोजन करवाया, दक्षिणा दी। सब विदा हो गए, अब तुम भी खाना खा लो।’
ये बात सुनते ही नरसी जी समझ गए कि उनके इष्ट स्वयं उनका मान रख गए।

गरीब के मान को, भक्त की लाज को परम प्रेमी करूणामय भगवान् ने बचा ली।
मन भर कर गाते रहे :-

कृष्णजी, कृष्णजी, कृष्णजी 

कहें तो उठो रे प्राणी।

कृष्णजी ना नाम बिना जे बोलो 

तो मिथ्या रे वाणी।।
भक्त के मन में अगर सचमुच समर्पण का भाव हो तो भगवान स्वयं ही उपस्थित हो जाते हैं.।।।

अग्नि संस्कार 

🔥अग्नि (अगि गतौ, अंगेनलोपश्च, अंग्+नि और नकार का लोप) वह अग्नि है🔥

अग्नि का सर्वप्रथम स्थान :: 
पृथ्वी आदि स्थानीय देवों में अग्नि का सर्वप्रथम स्थान है। अग्नि यज्ञीय अग्नि का प्रतिनिधि रूप है। यज्ञ के द्वारा मनुष्य का सम्बन्ध देवों से होता है। अत: यज्ञ की अग्नि मनुष्य और देवता के बीच सम्बन्ध का सूचक है। परन्तु अग्नि का स्वरूप भौतिक भी है। इनका स्वरूप गरजते हुए वृषभ के समान बतलाया गया है। उन्हें सिर और पैर नहीं हैं परन्तु जिह्वा लाल है। उत्पत्ति के समय अग्नि का स्वरूप बछड़े के समान है, परन्तु प्रज्वलित होने पर उनका स्वरूप अश्व के समान है। उनकी ज्वाला को विद्युत के समान कहा गया है। काष्ठ और घृत को उनका भोजन माना गया है। अग्नि धूम पताका के समान ऊपर की ओर जाता है। इसी कारण से अग्नि को धूमकेतु कहा गया है। यज्ञ के समय इनका आह्वान किया जाता है कि ये कुश के आसन पर विराजमान हों तथा देवों के हविष को ग्रहण करें। अग्नि का जन्म स्थान स्वर्ग माना गया है। स्वर्ग से मातरिश्वा इन्हें धरती पर लाये। अग्नि ज्ञान का प्रतीक है। वह सभी प्राणियों के ज्ञाता देव हैं। अत: इन्हें ‘जातवेदा:’ कहा गया है। अग्नि को द्युस्थानीय देवता सूर्य भी माना गया है। अग्नि को ‘त्रिविध’ तथा ‘द्विजन्मा’ भी कहा गया है। उनका प्रथम जन्म स्वर्ग में तथा दूसरा जन्म जल में (पृथ्वी पर) बतलाया गया है। अग्नि दानवों के भक्षक तथा मानवों के रक्षक माने गए हैं। इनका वर्णन दो सौ वैदिक सूक्तों में प्राप्त होता है।

जो ऊपर की ओर जाता है (अगि गतौ, अंगेनलोपश्च, अंग्+नि और नकार का लोप) वह अग्नि है।
धर्म की वसु नामक पत्नी से अग्नि उत्पन्न हुए। उनकी पत्नी स्वाहा से पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। 
छठे मन्वन्तर में वसु की वसुधारा नामक पत्नी से द्रविणक आदि पुत्र हुए, जिनमें 45 अग्नि-संतान उत्पन्न हुए। इस प्रकार सब मिलाकर 49 अग्नि हैं। विभिन्न कर्मों में अग्नि के भिन्न-भिन्न नाम हैं। लौकिक कर्म में अग्नि का प्रथम नाम पावक है। 

गृहप्रवेश आदि में निम्नांकित अन्य नाम प्रसिद्ध हैं :-
अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते।पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभन:॥ 

सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि।नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्नि: प्राशने च शुचिस्तथा॥

सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भव:।गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते॥

वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजक: स्मृत:।चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे॥

प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहस:।लक्षहोमे तु वह्नि:स्यात कोटिहोमे हुताश्न:॥

पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा।पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारिके॥
वश्यर्थे शमनी नाम वरदानेऽभिदूषक:।कोष्ठे तु जठरी नाम क्रव्यादो मृतभक्षणे॥

विभिन्न रुप :: गर्भाधान में मारुत” कहते हैं। पुंसवन में चन्द्रमा, शुगांकर्म में शोभन, सीमान्त में मंगल, जातकर्म में प्रगल्भ, नामकरण में पार्थिव, अन्नप्राशन में शुचि, चूड़ाकर्म में सत्य, व्रतबन्ध (उपनयन) में समुद्भव, गोदान में सूर्य, केशान्त (समावर्तन) में अग्नि, विसर्ग (अर्थात् अग्निहोत्रादिक्रियाकलाप) में वैश्वानर, विवाह में योजक, चतुर्थी में शिखी धृति में अग्नि, प्रायश्चित (अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृतिहोम) में विधु, पाकयज्ञ (अर्थात् पाकांग होम, वृषोत्सर्ग, गृहप्रतिष्ठा आदि में) साहस, लक्षहोम में वह्नि, कोटि होम में हुताशन, पूर्णाहुति में मृड, शान्ति में वरद, पौष्टिक में बलद, आभिचारिक में क्रोधाग्नि, वशीकरण में शमन, वरदान में अभिदूषक, कोष्ठ में जठर और मृत भक्षण में क्रव्यादम कहा गया है।

ऋग्वेद में अग्नि को देवमण्डल का प्राचीनतम सदस्य माना है। वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। अग्नि व्योम में सूर्य, अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत और पृथ्वी पर साधारण अग्नि के रूप में स्थित है। 
ऋग्वेद में सर्वाधिक सूक्त अग्नि को ही अर्पित हैं। वह गृहपति है और परिवार के सभी सदस्यों से उसका स्नेहपूर्ण घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह अन्धकार, निशाचर, जादू-टोना, राक्षस और रोगों को दूर करने वाला है। अग्नि है। पाचन और शक्ति निर्माण में इसका प्रमुख स्थान है। यज्ञीय अग्नि वेदिका में निवास करती है। वह समिधा, धृत और सोम से शक्तिमान होता है। वह मानवों और देवों के बीच मध्यस्थ और सन्देशवाहक है।
अग्नि दिव्य पुरोहित हैं और देवताओं का पौरोहित्य करते हैं।  वे यज्ञों के राजा है।नैतिक तत्वों से भी अग्नि का अभिन्न सम्बन्ध है। अग्नि सर्वदर्शी है। उसकी 1,000 आँखें हैं, जिनसे वे निरन्तर  मनुष्य के सभी कर्मों को निहारते रहते हैं। वे स्वयं गुप्तचर भी हैं और  मनुष्य के गुप्त जीवन को भी जानते हैं। वे ऋतुओं  के संरक्षक हैं। अग्नि पापों को तोलते हैं और पापियों को दण्ड देते हैं। वे पाप को क्षमा भी करते हैं। अग्नि की तुलना बृहस्पति और ब्रह्मणस्पति से भी की गई है। वे  मंत्र, धी (बुद्धि) और ब्रह्म के उत्पादक हैं। 

जैमिनी ने मीमांसासूत्र के “हवि:प्रक्षेपणाधिकरण” में अग्नि के (1). गार्हपत्य, (2). आहवनीय, (3). दक्षिणाग्नि, (4). सभ्य, (5). आवसथ्य और (6). औपासन छ: प्रकार  हैं। 
अग्नि को पाँच प्रकार का माना गया है। अग्नि उदात्त तथा विशद है। कर्मकाण्ड का श्रौत भाग और गृह्य का मुख्य केन्द्र अग्निपूजन ही है। देवमण्डल में इन्द्र के अनन्तर अग्नि का ही दूसरा स्थान है। जिसकी स्तुति लगभग दो सौ सूक्तों में वर्णित है। अग्नि के वर्णन में उसका पार्थिव रूप ज्वाला, प्रकाश आदि वैदिक ऋषियों के सामने सदा विद्यमान रहता है। अग्नि की उपमा अनेक पशुओं से दी गई है। प्रज्वलित अग्नि गर्जनशील वृषभ के समान है। उसकी ज्वाला सौर किरणों के तुल्य, उषा की प्रभा तथा विद्युत की चमक के समान है। उसकी आवाज़ आकाश की गर्जन जैसी गम्भीर है। अग्नि के लिए विशेष गुणों को लक्ष्य कर अनेक अभिधान प्रयुक्त करके किए जाते हैं। प्रज्वलित होने पर धूमशिखा के निकलने के कारण धूमकेतु इस विशिष्टिता का द्योतक एक प्रख्यात अभिधान है। अग्नि का ज्ञान सर्वव्यापी है और वह उत्पन्न होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है। इसलिए वह ‘जातवेदा:’ के नाम से विख्यात है। अग्नि कभी द्यावापृथिवी का पुत्र और कभी द्यौ: का सूनु (पुत्र) कहा गया है। उसके तीन जन्मों का वर्णन वेदों में मिलता है। जिनके स्थान हैं :- स्वर्ग, पृथ्वी तथा जल। स्वर्ग, वायु तथा पृथ्वी अग्नि के तीन सिर, तीन जीभ तथा तीन स्थानों का बहुत निर्देश वेद में उपलब्ध होता है। अग्नि के दो जन्मों का भी उल्लेख मिलता है :-भूमि तथा स्वर्ग। अग्नि का जन्म स्वर्ग में ही मुख्यत: हुआ, जहाँ से मातरिश्वा ने मनुष्यों के कल्याणार्थ उसका इस भूतल पर आनयन किया। अग्नि देव को अन्य समस्त देवों में प्रमुख माना गया है। अग्नि का पूजन भारतीय संस्कृति का प्रमुख चिह्न है और वह गृहदेवता के रूप में उपासना और पूजा का एक प्रधान विषय है। इसलिए अग्नि ‘गृहा’, ‘गृहपति’ (घर का स्वामी) तथा ‘विश्वपति’ (जन का रक्षक) कहलाता है।[अवेस्ता]
राहुगण तथा विदेध माधव के नेतृत्व में अग्नि का सारस्वत मण्डल से पूरब की ओर जाने का वर्णन मिलता है।  इस प्रकार अग्नि की उपासना वैदिक धर्म का नितान्त ही आवश्यक अंग है।[शतपथ ब्राह्मण] 

अग्नि के रूप :: 
पिंगभ्रूश्मश्रुकेशाक्ष: पीनांगजठरोऽरुण:। छागस्थ: साक्षसूत्रोऽग्नि: सप्तार्चि: शक्तिधारक:॥ 

भौहें, दाढ़ी, केश और आँखें पीली हैं। अंग स्थूल हैं और उदर लाल है। बकरे पर आरूढ़ हैं, अक्षमाला लिये है। इसकी सात ज्वालाएँ हैं और शक्ति को धारण करता है।
अग्नि के शुभ लक्षण :: 
अर्चिष्मान् पिण्डितशिख: सर्पि:काञ्चनसन्निभ:। स्निग्ध: प्रदक्षिणश्चैव वह्नि: स्यात् कार्यसिद्धये॥ 

ज्वालायुक्त, पिण्डितशिख, घी एवं सुवर्ण के समान, चिकना और दाहिनी ओर गतिशील अग्नि सिद्धिदायक होता है।

देहजन्य अग्नि में शब्द-ध्वनि उत्पादन की शक्ति होती है :-

आत्मना प्रेरितं चित्तं वह्निमाहन्ति देहजम्। ब्रह्मग्रन्थिस्थितं प्राणं स प्रेरयति पावक:॥ 

पावकप्रेरित: सोऽथ क्रमदूर्ध्वपथे चरन्। अतिसूक्ष्मध्वनि नाभौ हृदि सूक्ष्मं गले पुन:॥ 

पुष्टं शीर्षे त्वपुष्टञ्च कृत्रिमं वदने तथा। आविर्भावयतीत्येवं पञ्चधा कीर्त्यते बुधै:॥ 

नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विंदु:। जात: प्राणाग्निसंयोगात्तेन नादोऽभिधीयते॥ 
आत्मा के द्वारा प्रेरित चित्त देह में उत्पन्न अग्नि को आहत करता है। ब्रह्मग्रन्थि में स्थित प्रेरित वह प्राण क्रम से ऊपर चलता हुआ नाभि में अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि करता है तथा गले और हृदय में भी सूक्ष्म ध्वनि करता है। सिर में पुष्ट और अपुष्ट तथा मुख में कृत्रिम प्रकाश करता है।
 विद्वानों ने पाँच प्रकार का अग्नि बताया है।

 नकार प्राण का नाम है, 

दकार अग्नि का नाम है। 

प्राण और अग्नि के संयोग से नाद की उत्पत्ति होती है।

 सब देवताओं में इसका प्रथम आराध्यत्व ऋग्वेद के सर्वप्रथम मंत्र “अग्निमीले पुरोहितम्” से प्रकट होता है।


योगाग्नि अथवा ज्ञानाग्नि के रूप में भी “अग्नि” का प्रयोग होता है :-

‘ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा। ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणि तमाहु: पण्डितं बुधा:॥ 

ॐ रुद्राय नम: 

ॐ श्रीपरमात्मने नमः #  । श्रीवराह् पुराण – 2/3 ।

*॥ सृष्टि – शिव-शक्ति (गौरा) कथा – 15॥*

*। पार्वती ( उमा ) और शँकरजी विवाह ।*

जय श्रीहरि भक्तो


इस प्रकार कहकर पर्वतराज हिमालय सम्पूर्ण देवताओं के पितामह ब्रह्मा जी के पास गये । वहाँ उनका दर्शन कर गिरिराज हिमालय ने नम्रता पूर्वक कहा– ‘ भगवन ! उमा मेरी पुत्री हैं । आज मैं उसे भगवान रुद्र को देना चाहता हूँ ।’ इसपर श्रीब्रह्माजी ने भी उन्हें ‘ दे दो ‘ कहकर अनुमति दे दी ।

ब्रह्मा जी के ऐसा कहने पर पर्वतराज हिमालय अपने घर पर गये और तुरंत ही तुम्बरू, नारद, हाहा औऱ हूहू को बुलाया । फिर किन्नरों, असुरों औऱ राक्षसों को भी मूर्ति धारणकर भगवान शंकर के साथ होने वाले पार्वती के विवाह को देखने के लिए वहाँ आये । उस विवाह में पृथ्वी ही वेदी बनी औऱ सातों समुद्र ही कलश । सूर्य और चन्द्र्मा उस शुभ अवसर पर दीपक का कार्य कर रहे थे तथा नदियाँ जल ढोनें-परसने का काम कर रही थीं । जब इस प्रकार सारी व्यवस्था हो गई, तब गिरिराज हिमालय ने मन्दराचल को भगवान शंकर के पास भेजा । भगवान शंकर की स्वीकृति से मन्दराचल तत्काल वापस आ गए । फिर तो भगवान शंकर ने विधि पूर्वक उमा का पाणिग्रहण किया । उस विवाह के उत्सव पर पर्वत औऱ नारद – ये दोनों गान कर रहे थे । सिद्धों ने नाचने का काम पूरा किया था । वनस्पतियाँ अनेक प्रकार के पुष्पों की वर्षा कर रही थी तथा सुन्दर रूपवती अप्सराएँ उच्च स्वर से गान-गाकर नृत्य करने में संलग्न थी । उस विवाह -महोत्सव में लोक पितामह चतुर्मुख ब्रह्मा जी स्वंय ब्राह्मण के स्थान पर विराजमान थे । उन्होंने प्रसन्न होकर उमा से कहा- ‘ पुत्री ! संसार में तुम जैसी पत्नी और शंकर-सरीखे पति सबको सुलभ हों ।’ भगवान शंकर औऱ भगवती उमा दोनों एक साथ बैठे थे । उनसे इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी अपने धामको लौट आये ।

       भगवान वराह कहते है– पृथ्वी ! रुद्र का प्राकट्य, गौरी का जन्म तथा विवाह  यह सारा प्रसंग राजा प्रजापाल के पूछने पर परम् तपस्वी महातपा ऋषि ने उन्हें जैसे सुनाया था, वह सम्पूर्ण बृतान्त मैंने तुम्हें बता दिया । देवी गौरी के जन्म, विवाह आदि-सभी कार्य तृतीया तिथि को ही सम्पन हुए थे, अतएव तृतीया उनकी तिथि मानी जाती हैं । उस तिथि को नमक खाना सर्वथा निषिद्ध है । जो स्त्री उस दिन उपवास करती हैं, उसे अचल सौभाग्य की प्राप्ति होती हैं । दुर्भाग्य ग्रस्त स्त्री या पुरुष तृतीया तिथि को लवण के परित्याग पूर्वक इस प्रसंग का श्रवण करे तो उसको सौभाग्य, धन-सम्पति औऱ मनोवांछित पदार्थो की प्राप्ति होती हैं, उसे जगत में उतम स्वास्थ्य, कान्ति औऱ पुष्टि का भी लाभ होता है ।
            ☺॥ ॐ नमोनमः हर हर शिवशम्भु-पार्वती जी ॥

                             । प्रसंग दो समाप्त ।

क्रमशः – ✍ भाग – 16

महाकाली हृदय स्तोत्र 

श्री महाकाली हृदय स्तोत्रम 

श्री भगवती महाकाली हृदय स्तोत्र का पाठ आप पूजन मे भगवती का आवाहन करते समय अपने हृदय चक्र पर मा का ध्यान करते हुये पढे .. पुजन के अतिरिक्त इतर समय मे कभी भी पढ सकते है .. अनाहत चक्र मे स्पंदन अनुभुत होंगे .. 
॥ श्रीकालिकाहृदयम् ॥
 ॐ अस्य श्रीदक्षिणकाल्या हृदयस्तोत्रमन्त्रस्य 

श्रीमहाकाल ऋषिः । उष्णिक्छन्दः ।

 श्रीदक्षिणकालिका देवता । 

क्रीं बीजं । ह्रीं शक्तिः । नमः कीलकं । 

सर्वत्र सर्वदा जपे विनियोगः 
॥ अथ हृदयादिन्यासः । 

ॐ क्रां हृदयाय नमः । 

ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा । 

ॐ क्रूं शिखायै वषट् । 

ॐ क्रैं कवचाय हुं । 

ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।

 ॐ क्रः अस्त्राय फट् ॥ 

इति हृदयादिन्यासः
 ॥ अथ ध्यानम् । 

ॐ ध्यायेत्कालीं महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणीम् । 

चतुर्भुजां ललजिह्वां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ १॥
 नीलोत्पलदलप्रख्यां शत्रुसङ्घविदारिणीम् । 

नरमुण्डं तथा खङ्गं कमलं वरदं तथा ॥ २॥ 
बिभ्राणां रक्तवदनां दंष्ट्रालीं घोररूपिणीम् । 

अट्टाट्टहासनिरतां सर्वदा च दिगम्बराम् ॥ ३॥ 
शवासनस्थितां देवीं मुण्डमालाविभूषिताम् । 

इति ध्यात्वा महादेवीं ततस्तु हृदयं पठेत् ॥ ४॥ 
ॐ कालिका घोररूपाढया सर्वकामफलप्रदा । 

सर्वदेवस्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु मे ॥ ५॥ 
ह्रींह्रींस्वरूपिणी श्रेष्ठा त्रिषु लोकेषु दुर्लभा ।

 तव स्नेहान्मया ख्यातं न देयं यस्य कस्यचित् ॥ ६॥ 
अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि निशामय परात्मिके । 

यस्य विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तो भविष्यति ॥ ७॥
 नागयज्ञोपवीताञ्च चन्द्रार्द्धकृतशेखराम् । 

जटाजूटाञ्च सञ्चिन्त्य महाकालसमीपगाम् ॥ ८॥ 
एवं न्यासादयः सर्वे ये प्रकुर्वन्ति मानवाः । 

प्राप्नुवन्ति च ते मोक्षं सत्यं सत्यं वरानने ॥ ९॥ 
यन्त्रं श्रृणु परं देव्याः सर्वार्थसिद्धिदायकम् । 

गोप्यं गोप्यतरं गोप्यं गोप्यं गोप्यतरं महत् ॥ १०॥ 
त्रिकोणं पञ्चकं चाष्टकमलं भूपुरान्वितम् । 

मुण्डपङ्क्तिं च ज्वालां च कालीयन्त्रं सुसिद्धिदम् ॥ ११॥ 
मन्त्रं तु पूर्वकथितं धारयस्व सदा प्रिये । 

देव्या दक्षिणकाल्यास्तु नाममालां निशामय ॥ १२॥ 
काली दक्षिणकाली च कृष्णरूपा परात्मिका ।

 मुण्डमाला विशालाक्षी सृष्टिसंहारकारिका ॥ १३ ॥ 
स्थितिरूपा महामाया योगनिद्रा भगात्मिका । 

भगसर्पिःपानरता भगोद्योता भगाङ्गजा ॥ १४ ॥ 
आद्या सदा नवा घोरा महातेजाः करालिका । 

प्रेतवाहा सिद्धिलक्ष्मीरनिरुद्धा सरस्वती ॥ १५॥ 
एतानि नाममाल्यानि ये पठन्ति दिने दिने । 

तेषां दासस्य दासोऽहं सत्यं सत्यं महेश्वरि ॥ १६॥ 
ॐ कालीं कालहरां देवी कङ्कालबीजरूपिणीम् । 

कालरूपां कलातीतां कालिकां दक्षिणां भजे ॥ १७॥
 कुण्डगोलप्रियां देवीं खयम्भूकुसुमे रताम् ।

 रतिप्रियां महारौद्रीं कालिकां प्रणमाम्यहम् ॥ १८॥ 
दूतीप्रियां महादूतीं दूतीयोगेश्वरीं पराम् । 

दूतोयोगोद्भवरतां दूतीरूपां नमाम्यहम् ॥ १९॥ 
क्रींमन्त्रेण जलं जप्त्वा सप्तधा सेचनेन तु । 

सर्वे रोगा विनश्यन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ २०॥
 क्रींस्वाहान्तैर्महामन्त्रैश्चन्दनं साधयेत्ततः । 

तिलकं क्रियते प्राज्ञैर्लोको वश्यो भवेत्सदा ॥ २१॥ 
क्रीं हूं ह्रीं मन्त्रजप्तैश्च ह्यक्षतैः सप्तभिः प्रिये । 

महाभयविनाशश्च जायते नात्र संशयः ॥ २२॥ 
क्रीं ह्रीं ह्रूं स्वाहा मन्त्रेण श्मशानाग्निं च मन्त्रयेत् ।

 शत्रोर्गृहे प्रतिक्षिप्त्वा शत्रोर्मृत्युर्भविष्यति ॥ २३॥ 
ह्रूं ह्रीं क्रीं चैव उच्चाटे पुष्पं संशोध्य सप्तधा । 

रिपूणां चैव चोच्चाटं नयत्येव न संशयः ॥ २४॥ 
आकर्षणे च क्रीं क्रीं क्रीं जप्त्वाऽक्षतान् प्रतिक्षिपेत् । सहस्रयोजनस्था च शीघ्रमागच्छति प्रिये ॥ २५॥ 
क्रीं क्रीं क्रीं ह्रूं ह्रूं ह्रीं ह्रीं च कज्जलं शोधितं तथा ।

 तिलकेन जगन्मोहः सप्तधा मन्त्रमाचरेत् ॥ २६॥
 हृदयं परमेशानि सर्वपापहरं परम् । 

अश्वमेधादियज्ञानां कोटिकोटिगुणोत्तरम् ॥ २७॥
 कन्यादानादिदानानां कोटिकोटिगुणं फलम् । दूतीयागादियागानां कोटिकोटिफलं स्मृतम् ॥ २८॥
 गङ्गादिसर्वतीर्थानां फलं कोटिगुणं स्मृतम् ।

 एकधा पाठमात्रेण सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ २९॥
 कौमारीस्वेष्टरूपेण पूजां कृत्वा विधानतः । 

पठेत्स्तोत्रं महेशानि जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ ३०॥ 
रजस्वलाभगं दृष्ट्वा पठेदेकाग्रमानसः ।

 लभते परमं स्थानं देवीलोके वरानने ॥ ३१॥ 
महादुःखे महारोगे महासङ्कटके दिने । 

महाभये महाघोरे पठेतस्तोत्रं महोत्तमम् । 

सत्यं सत्यं पुनः सत्यं गोपायेन्मातृजारवत् ॥ ३२॥
 इति श्रीकालीह ॥