ब्रज भक्तमाल कथा* 

💐🌺 *ब्रज भक्तमाल कथा* 🌺💐
  *भगवत रसिक जी का चरित्र*
       श्री राम गोपाल नाम के एक भक्त थे। वह भगवत रसिक जी से विरक्त वेष लेकर भजन करना चाहते थे। लेकिन उसके अंदर झांक कर *श्री भगवत रसिक जी* बोले – तुम अभी घर पर रहकर ही भजन करो, तेरे तुम्हारे अंदर अभी कुछ वासनाएं शेष है। उन्हें भोगकर हमारे पास आ जाना । गुरु आज्ञा मानकर भजन करने लगा और अंत में भगवत रसिक जी के निकुंज गमन के पश्चात वह ही वही जा पहुंचा ।

 गुरु की आज्ञा मानना ही सर्वश्रेष्ठ भजन है। श्री भगवत रसिक जी की स्थिति बहुत ही उठ चुकी थी। देह गेह के भेद का भान ही नहीं था। जाति तो देह की होती है। रसिक अनन्य की कोई जाति नहीं होती। स्वयं मधुकरी वृति से रहते । एक दिन किसी धोबी के घर से मधुकरी ले आए किसी ईर्ष्यालु ने जाकर गुरु जी से शिकायत कर दी। श्री ललित मोहनी दास जी ने भ्रमवश भगवत रसिक जी को वृंदावन से बाहर जाने की आज्ञा दे दी।

भगवत रसिक जी इस निर्णय से बहुत दुखी हुए लेकिन गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर यमुना जी के किनारे किनारे वृंदावन को हृदय में बसाकर प्रयाग की ओर चल पड़े। उनके साथ कुछ संत भी हो लिए। जिनमें रसरंग जी, बिहारी बल्लभ जी, मोहनदास आदि प्रमुख थे। मार्ग में एक घनघोर जंगल आया जिसमें एक नरभक्षी सिंह रहता था। मोहन दास जी ने यही विश्राम करने की प्रार्थना की। 

भगवत रसिक जी बोले -डरो मत साथ चलो। सिंह आया तो उसे देखकर भगवत रसिक जी ने अपने करुुआ के जल को उसके ऊपर छिड़का और प्रहलाद जी की कथा सुनाकर उसकी सारी विषमता का हरण करके पीपाजी की तरह भक्त बना दिया ।

सिंह शिष्य बन गया। सभी जय जय कर उठे। भगवत रसिक जी संतो के साथ प्रयाग पहुंचे और अड़ैल के समीप यमुना किनारे एक मड़ी में निवास करने लगे। यही भजन भावना में लीन रहते। कुछ संतो से सुना है एक वयोवृद्ध संत भगवत रसिक जी की वाणी की एक प्रति हस्तलिखित वृंदावन आकर श्री ललित मोहनी दास जी को अमूल्य निधि बताकर भेंट कर गए। उसे पढ़ कर अति प्रसन्न हुए लेकिन एक पद “चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नाहि।’ को देखकर संकोच में पड़ गए कि इसका भक्तों में प्रचार करें कि नहीं । अगले दिन प्रात यमुना स्नान करने गए तो ग्रंथ साथ ले गए। स्नान के पश्चात यमुनाजी में ग्रंथ प्रवाहित कर के वापस आ गये। दूसरे दिन स्नान को गए और डुबकी लगा बाहर निकले तो ग्रंथ उनके हाथ में आ गया।

पुनः प्रवाहित कर के वापस आ गए तीसरे दिन पुनः स्नान को पधारें

तो डुबकी लगाते ही ग्रंथ हाथों में आ गया । ग्रंथ का बस्ता रंच मात्र भी भीगा नहीं था ।

 विचार में पड़ गए क्या करें ? उसी समय यमुना जी बोली- इसे साथ ले जाइए इस ग्रंथ के द्वारा रसिक भक्तों का कल्याण होगा। तब श्री ललित मोहनी जी अपने साथ ले आए। जो इस वाणी को पढ़ता सुनता है उसके हृदय में श्यामा श्याम की नित्यकेलि की लीलाएं प्रगट हो जाती हैं ।

जब श्री भगवत रसिक जी निकुंज महल जाने लगे तो गंगा जी प्रगट हो कर बोली – आप शिवलोक चलिए और उसे पवित्र कीजिए। सरस्वती जी कहने लगी – ब्रह्मा जी आपकी राह देख रहे हैं। 

यमुनाजी मुस्कुराती हुई बोली -चलो वृंदावन चले। वही नित्य स्वरूप से श्यामा श्याम जी की सेवा करना। देवता आदि इंद्र के साथ बोले – आप स्वर्ग चलें वहां सुख भोगे। भगवत रसिक जी बोले – स्वर्ग में सुख विनाशी है । इसलिए हे देवताओं! श्यामा श्याम के समीप वृंदावन जाएंगे। वहां हरिदासी नित्य लाड लड़ाती है। उन्ही के चरणों में हमारी आस्था है।

 ऐसा कहकर प्रयाग में ही अपनी नित्य सखी स्वरूप को धारण करके निकुंज महल के निकुंज परिकर में पांच भौतिक शरीर को छोड़कर जा मिले । प्रयाग में ही इनकी समाधि बनी हुई है । इन महापुरुषों का जीवन चरित्र साधक को साधना का मार्ग प्रशस्त करता है । इसलिए सदैव अपने मन को उन महापुरुषों के परम पावन चरित्रों में निमज्जन कराना चाहिए।

 

🥀🙏🏻 *जय जय श्रीराधे* 🙏🏻🥀

नरसी मेहता 

प्रेरक प्रसंग

“”* भगवान “” और “” भक्त “” …..?
“*नरसी मेहता जी के जीवन की एक घटना आप सभी महानुभावों को समर्पित ।

एक बार नरसी जी का बड़ा भाई वंशीधर नरसी जी के घर आया। पिता जी का वार्षिक श्राद्ध करना था।
वंशीधर ने नरसी जी से कहा :- ‘कल पिताजी का वार्षिक श्राद्ध करना है। कहीं अड्डेबाजी मत करना बहु को लेकर मेरे यहाँ आ जाना। काम-काज में हाथ बटाओगे तो तुम्हारी भाभी को आराम मिलेगा।’
नरसी जी ने कहा :- ‘पूजा पाठ करके ही आ सकूँगा।’ इतना सुनना था कि वंशीधर उखड गए और बोले :- ‘जिन्दगी भर यही सब करते रहना, जिसकी गृहस्थी भिक्षा से चलती है, उसकी सहायता की मुझे जरूरत नहीं है।

तुम पिताजी का श्राद्ध अपने घर पर अपने हिसाब से कर लेना।’
नरसी जी ने कहा :-“नाराज क्यों होते हो भैया ? मेरे पास जो कुछ भी है, मैं उसी से श्राद्ध कर लूँगा।’ दोनों भाईयों के बीच श्राद्ध को लेकर झगडा हो गया है, नागर-मंडली को मालूम हो गया।
नरसी अलग से श्राद्ध करेगा, ये सुनकर नागर मंडली ने बदला लेने की सोची। पुरोहित प्रसन्न राय ने सात सौ ब्राह्मणों को नरसी के यहाँ आयोजित श्राद्ध में आने के लिए आमंत्रित कर दिया।
प्रसन्न राय ये जानते थे कि नरसी का परिवार मांगकर भोजन करता है। वह क्या सात सौ ब्राह्मणों को भोजन कराएगा…? आमंत्रित ब्राह्मण नाराज होकर जायेंगे और तब उसे ज्यातिच्युत कर दिया जाएगा।
अब कहीं से इस षड्यंत्र का पता नरसी मेहता जी की पत्नी मानिकबाई जी को लग गया वह चिंतित हो उठी।
अब दुसरे दिन नरसी जी स्नान के बाद श्राद्ध के लिए घी लेने बाज़ार गए। नरसी जी घी उधार में चाहते थे पर किसी ने उनको घी नहीं दिया।

अंत में एक दुकानदार राजी हो गया पर ये शर्त रख दी कि नरसी को भजन सुनाना पड़ेगा।

बस फिर क्या था, मन पसंद काम और उसके बदले घी मिलेगा, ये तो आनंद हो गया।

अब हुआ ये कि नरसी जी भगवान का भजन सुनाने में इतने तल्लीन हो गए कि ध्यान ही नहीं रहा कि घर में श्राद्ध है।
( मित्रों ये घटना सभी के सामने हुयी है। आज भी कई जगह ऎसी घटनाएं प्रभु करते हैं ऐसा कुछ अनुभव है। ऐसे-ऐसे लोग हुए हैं इस पावन धरा पर। )
तो आईये कथा मे आगे चलते हैं…

अब नरसी मेहता जी गाते गए भजन उधर नरसी के रूप में भगवान कृष्ण श्राद्ध कराते रहे। जयहो प्रभू, दुकानदार के यहाँ नरसी जी भजन गा रहे हैं और वहां श्राद्ध “कृष्ण भगवान” नरसी जी के भेस में करवा रहे हैं।
जय हो, जय हो वाह प्रभू क्या माया है,अद्भुत, भक्त के सम्मान की रक्षा को स्वयं भेस धर लिए। वो कहते हैं ना की :-
“अपना मान भले टल जाए, 

भक्त का मान न टलते देखा…?

प्रबल प्रेम के पाले पड़ कर, 

प्रभु को नियम बदलते देखा ।

अपना मान भले टल जाये, 

भक्त मान नहीं टलते देखा ।।
तो महाराज सात सौ ब्राह्मणों ने छककर भोजन किया। दक्षिणा में एक एक अशर्फी भी प्राप्त की। सात सौ ब्राह्मण आये तो थे नरसी जी का अपमान करने और कहाँ बदले में सुस्वादु भोजन और अशर्फी दक्षिणा के रूप में…

वाह प्रभु धन्य है आप और आपके भक्त।
दुश्त्मति ब्राह्मण सोचते रहे कि ये नरसी जरूर जादू-टोना जानता है। इधर दिन ढले घी लेकर नरसी जी जब घर आये तो देखा कि मानिक्बाई जी भोजन कर रही है। नरसी जी को इस बात का क्षोभ हुआ कि श्राद्ध क्रिया आरम्भ नहीं हुई और पत्नी भोजन करने बैठ गयी।
नरसी जी बोले :- ‘वो आने में ज़रा देर हो गयी। क्या करता, कोई उधार का घी भी नहीं दे रहा था, मगर तुम श्राद्ध के पहले ही भोजन क्यों कर रही हो……..?’
मानिक बाई जी ने कहा :- ‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है…?

स्वयं खड़े होकर तुमने श्राद्ध का सारा कार्य किया। ब्राह्मणों को भोजन करवाया, दक्षिणा दी। सब विदा हो गए, अब तुम भी खाना खा लो।’
ये बात सुनते ही नरसी जी समझ गए कि उनके इष्ट स्वयं उनका मान रख गए।

गरीब के मान को, भक्त की लाज को परम प्रेमी करूणामय भगवान् ने बचा ली।
मन भर कर गाते रहे :-

कृष्णजी, कृष्णजी, कृष्णजी 

कहें तो उठो रे प्राणी।

कृष्णजी ना नाम बिना जे बोलो 

तो मिथ्या रे वाणी।।
भक्त के मन में अगर सचमुच समर्पण का भाव हो तो भगवान स्वयं ही उपस्थित हो जाते हैं.।।।

अग्नि संस्कार 

🔥अग्नि (अगि गतौ, अंगेनलोपश्च, अंग्+नि और नकार का लोप) वह अग्नि है🔥

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अग्नि का सर्वप्रथम स्थान :: 
पृथ्वी आदि स्थानीय देवों में अग्नि का सर्वप्रथम स्थान है। अग्नि यज्ञीय अग्नि का प्रतिनिधि रूप है। यज्ञ के द्वारा मनुष्य का सम्बन्ध देवों से होता है। अत: यज्ञ की अग्नि मनुष्य और देवता के बीच सम्बन्ध का सूचक है। परन्तु अग्नि का स्वरूप भौतिक भी है। इनका स्वरूप गरजते हुए वृषभ के समान बतलाया गया है। उन्हें सिर और पैर नहीं हैं परन्तु जिह्वा लाल है। उत्पत्ति के समय अग्नि का स्वरूप बछड़े के समान है, परन्तु प्रज्वलित होने पर उनका स्वरूप अश्व के समान है। उनकी ज्वाला को विद्युत के समान कहा गया है। काष्ठ और घृत को उनका भोजन माना गया है। अग्नि धूम पताका के समान ऊपर की ओर जाता है। इसी कारण से अग्नि को धूमकेतु कहा गया है। यज्ञ के समय इनका आह्वान किया जाता है कि ये कुश के आसन पर विराजमान हों तथा देवों के हविष को ग्रहण करें। अग्नि का जन्म स्थान स्वर्ग माना गया है। स्वर्ग से मातरिश्वा इन्हें धरती पर लाये। अग्नि ज्ञान का प्रतीक है। वह सभी प्राणियों के ज्ञाता देव हैं। अत: इन्हें ‘जातवेदा:’ कहा गया है। अग्नि को द्युस्थानीय देवता सूर्य भी माना गया है। अग्नि को ‘त्रिविध’ तथा ‘द्विजन्मा’ भी कहा गया है। उनका प्रथम जन्म स्वर्ग में तथा दूसरा जन्म जल में (पृथ्वी पर) बतलाया गया है। अग्नि दानवों के भक्षक तथा मानवों के रक्षक माने गए हैं। इनका वर्णन दो सौ वैदिक सूक्तों में प्राप्त होता है।

जो ऊपर की ओर जाता है (अगि गतौ, अंगेनलोपश्च, अंग्+नि और नकार का लोप) वह अग्नि है।
धर्म की वसु नामक पत्नी से अग्नि उत्पन्न हुए। उनकी पत्नी स्वाहा से पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। 
छठे मन्वन्तर में वसु की वसुधारा नामक पत्नी से द्रविणक आदि पुत्र हुए, जिनमें 45 अग्नि-संतान उत्पन्न हुए। इस प्रकार सब मिलाकर 49 अग्नि हैं। विभिन्न कर्मों में अग्नि के भिन्न-भिन्न नाम हैं। लौकिक कर्म में अग्नि का प्रथम नाम पावक है। 

गृहप्रवेश आदि में निम्नांकित अन्य नाम प्रसिद्ध हैं :-
अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते।पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभन:॥ 

सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि।नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्नि: प्राशने च शुचिस्तथा॥

सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भव:।गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते॥

वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजक: स्मृत:।चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे॥

प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहस:।लक्षहोमे तु वह्नि:स्यात कोटिहोमे हुताश्न:॥

पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा।पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारिके॥
वश्यर्थे शमनी नाम वरदानेऽभिदूषक:।कोष्ठे तु जठरी नाम क्रव्यादो मृतभक्षणे॥

विभिन्न रुप :: गर्भाधान में मारुत” कहते हैं। पुंसवन में चन्द्रमा, शुगांकर्म में शोभन, सीमान्त में मंगल, जातकर्म में प्रगल्भ, नामकरण में पार्थिव, अन्नप्राशन में शुचि, चूड़ाकर्म में सत्य, व्रतबन्ध (उपनयन) में समुद्भव, गोदान में सूर्य, केशान्त (समावर्तन) में अग्नि, विसर्ग (अर्थात् अग्निहोत्रादिक्रियाकलाप) में वैश्वानर, विवाह में योजक, चतुर्थी में शिखी धृति में अग्नि, प्रायश्चित (अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृतिहोम) में विधु, पाकयज्ञ (अर्थात् पाकांग होम, वृषोत्सर्ग, गृहप्रतिष्ठा आदि में) साहस, लक्षहोम में वह्नि, कोटि होम में हुताशन, पूर्णाहुति में मृड, शान्ति में वरद, पौष्टिक में बलद, आभिचारिक में क्रोधाग्नि, वशीकरण में शमन, वरदान में अभिदूषक, कोष्ठ में जठर और मृत भक्षण में क्रव्यादम कहा गया है।

ऋग्वेद में अग्नि को देवमण्डल का प्राचीनतम सदस्य माना है। वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। अग्नि व्योम में सूर्य, अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत और पृथ्वी पर साधारण अग्नि के रूप में स्थित है। 
ऋग्वेद में सर्वाधिक सूक्त अग्नि को ही अर्पित हैं। वह गृहपति है और परिवार के सभी सदस्यों से उसका स्नेहपूर्ण घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह अन्धकार, निशाचर, जादू-टोना, राक्षस और रोगों को दूर करने वाला है। अग्नि है। पाचन और शक्ति निर्माण में इसका प्रमुख स्थान है। यज्ञीय अग्नि वेदिका में निवास करती है। वह समिधा, धृत और सोम से शक्तिमान होता है। वह मानवों और देवों के बीच मध्यस्थ और सन्देशवाहक है।
अग्नि दिव्य पुरोहित हैं और देवताओं का पौरोहित्य करते हैं।  वे यज्ञों के राजा है।नैतिक तत्वों से भी अग्नि का अभिन्न सम्बन्ध है। अग्नि सर्वदर्शी है। उसकी 1,000 आँखें हैं, जिनसे वे निरन्तर  मनुष्य के सभी कर्मों को निहारते रहते हैं। वे स्वयं गुप्तचर भी हैं और  मनुष्य के गुप्त जीवन को भी जानते हैं। वे ऋतुओं  के संरक्षक हैं। अग्नि पापों को तोलते हैं और पापियों को दण्ड देते हैं। वे पाप को क्षमा भी करते हैं। अग्नि की तुलना बृहस्पति और ब्रह्मणस्पति से भी की गई है। वे  मंत्र, धी (बुद्धि) और ब्रह्म के उत्पादक हैं। 

जैमिनी ने मीमांसासूत्र के “हवि:प्रक्षेपणाधिकरण” में अग्नि के (1). गार्हपत्य, (2). आहवनीय, (3). दक्षिणाग्नि, (4). सभ्य, (5). आवसथ्य और (6). औपासन छ: प्रकार  हैं। 
अग्नि को पाँच प्रकार का माना गया है। अग्नि उदात्त तथा विशद है। कर्मकाण्ड का श्रौत भाग और गृह्य का मुख्य केन्द्र अग्निपूजन ही है। देवमण्डल में इन्द्र के अनन्तर अग्नि का ही दूसरा स्थान है। जिसकी स्तुति लगभग दो सौ सूक्तों में वर्णित है। अग्नि के वर्णन में उसका पार्थिव रूप ज्वाला, प्रकाश आदि वैदिक ऋषियों के सामने सदा विद्यमान रहता है। अग्नि की उपमा अनेक पशुओं से दी गई है। प्रज्वलित अग्नि गर्जनशील वृषभ के समान है। उसकी ज्वाला सौर किरणों के तुल्य, उषा की प्रभा तथा विद्युत की चमक के समान है। उसकी आवाज़ आकाश की गर्जन जैसी गम्भीर है। अग्नि के लिए विशेष गुणों को लक्ष्य कर अनेक अभिधान प्रयुक्त करके किए जाते हैं। प्रज्वलित होने पर धूमशिखा के निकलने के कारण धूमकेतु इस विशिष्टिता का द्योतक एक प्रख्यात अभिधान है। अग्नि का ज्ञान सर्वव्यापी है और वह उत्पन्न होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है। इसलिए वह ‘जातवेदा:’ के नाम से विख्यात है। अग्नि कभी द्यावापृथिवी का पुत्र और कभी द्यौ: का सूनु (पुत्र) कहा गया है। उसके तीन जन्मों का वर्णन वेदों में मिलता है। जिनके स्थान हैं :- स्वर्ग, पृथ्वी तथा जल। स्वर्ग, वायु तथा पृथ्वी अग्नि के तीन सिर, तीन जीभ तथा तीन स्थानों का बहुत निर्देश वेद में उपलब्ध होता है। अग्नि के दो जन्मों का भी उल्लेख मिलता है :-भूमि तथा स्वर्ग। अग्नि का जन्म स्वर्ग में ही मुख्यत: हुआ, जहाँ से मातरिश्वा ने मनुष्यों के कल्याणार्थ उसका इस भूतल पर आनयन किया। अग्नि देव को अन्य समस्त देवों में प्रमुख माना गया है। अग्नि का पूजन भारतीय संस्कृति का प्रमुख चिह्न है और वह गृहदेवता के रूप में उपासना और पूजा का एक प्रधान विषय है। इसलिए अग्नि ‘गृहा’, ‘गृहपति’ (घर का स्वामी) तथा ‘विश्वपति’ (जन का रक्षक) कहलाता है।[अवेस्ता]
राहुगण तथा विदेध माधव के नेतृत्व में अग्नि का सारस्वत मण्डल से पूरब की ओर जाने का वर्णन मिलता है।  इस प्रकार अग्नि की उपासना वैदिक धर्म का नितान्त ही आवश्यक अंग है।[शतपथ ब्राह्मण] 

अग्नि के रूप :: 
पिंगभ्रूश्मश्रुकेशाक्ष: पीनांगजठरोऽरुण:। छागस्थ: साक्षसूत्रोऽग्नि: सप्तार्चि: शक्तिधारक:॥ 

भौहें, दाढ़ी, केश और आँखें पीली हैं। अंग स्थूल हैं और उदर लाल है। बकरे पर आरूढ़ हैं, अक्षमाला लिये है। इसकी सात ज्वालाएँ हैं और शक्ति को धारण करता है।
अग्नि के शुभ लक्षण :: 
अर्चिष्मान् पिण्डितशिख: सर्पि:काञ्चनसन्निभ:। स्निग्ध: प्रदक्षिणश्चैव वह्नि: स्यात् कार्यसिद्धये॥ 

ज्वालायुक्त, पिण्डितशिख, घी एवं सुवर्ण के समान, चिकना और दाहिनी ओर गतिशील अग्नि सिद्धिदायक होता है।

देहजन्य अग्नि में शब्द-ध्वनि उत्पादन की शक्ति होती है :-

आत्मना प्रेरितं चित्तं वह्निमाहन्ति देहजम्। ब्रह्मग्रन्थिस्थितं प्राणं स प्रेरयति पावक:॥ 

पावकप्रेरित: सोऽथ क्रमदूर्ध्वपथे चरन्। अतिसूक्ष्मध्वनि नाभौ हृदि सूक्ष्मं गले पुन:॥ 

पुष्टं शीर्षे त्वपुष्टञ्च कृत्रिमं वदने तथा। आविर्भावयतीत्येवं पञ्चधा कीर्त्यते बुधै:॥ 

नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विंदु:। जात: प्राणाग्निसंयोगात्तेन नादोऽभिधीयते॥ 
आत्मा के द्वारा प्रेरित चित्त देह में उत्पन्न अग्नि को आहत करता है। ब्रह्मग्रन्थि में स्थित प्रेरित वह प्राण क्रम से ऊपर चलता हुआ नाभि में अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि करता है तथा गले और हृदय में भी सूक्ष्म ध्वनि करता है। सिर में पुष्ट और अपुष्ट तथा मुख में कृत्रिम प्रकाश करता है।
 विद्वानों ने पाँच प्रकार का अग्नि बताया है।

 नकार प्राण का नाम है, 

दकार अग्नि का नाम है। 

प्राण और अग्नि के संयोग से नाद की उत्पत्ति होती है।

 सब देवताओं में इसका प्रथम आराध्यत्व ऋग्वेद के सर्वप्रथम मंत्र “अग्निमीले पुरोहितम्” से प्रकट होता है।

[संगीतदर्पण]

योगाग्नि अथवा ज्ञानाग्नि के रूप में भी “अग्नि” का प्रयोग होता है :-

‘ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा। ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणि तमाहु: पण्डितं बुधा:॥ 

ॐ रुद्राय नम: 

ॐ श्रीपरमात्मने नमः #  । श्रीवराह् पुराण – 2/3 ।

*॥ सृष्टि – शिव-शक्ति (गौरा) कथा – 15॥*

*। पार्वती ( उमा ) और शँकरजी विवाह ।*

जय श्रीहरि भक्तो

                     ^-^-^-^-^-^-^^-^-^

इस प्रकार कहकर पर्वतराज हिमालय सम्पूर्ण देवताओं के पितामह ब्रह्मा जी के पास गये । वहाँ उनका दर्शन कर गिरिराज हिमालय ने नम्रता पूर्वक कहा– ‘ भगवन ! उमा मेरी पुत्री हैं । आज मैं उसे भगवान रुद्र को देना चाहता हूँ ।’ इसपर श्रीब्रह्माजी ने भी उन्हें ‘ दे दो ‘ कहकर अनुमति दे दी ।

ब्रह्मा जी के ऐसा कहने पर पर्वतराज हिमालय अपने घर पर गये और तुरंत ही तुम्बरू, नारद, हाहा औऱ हूहू को बुलाया । फिर किन्नरों, असुरों औऱ राक्षसों को भी मूर्ति धारणकर भगवान शंकर के साथ होने वाले पार्वती के विवाह को देखने के लिए वहाँ आये । उस विवाह में पृथ्वी ही वेदी बनी औऱ सातों समुद्र ही कलश । सूर्य और चन्द्र्मा उस शुभ अवसर पर दीपक का कार्य कर रहे थे तथा नदियाँ जल ढोनें-परसने का काम कर रही थीं । जब इस प्रकार सारी व्यवस्था हो गई, तब गिरिराज हिमालय ने मन्दराचल को भगवान शंकर के पास भेजा । भगवान शंकर की स्वीकृति से मन्दराचल तत्काल वापस आ गए । फिर तो भगवान शंकर ने विधि पूर्वक उमा का पाणिग्रहण किया । उस विवाह के उत्सव पर पर्वत औऱ नारद – ये दोनों गान कर रहे थे । सिद्धों ने नाचने का काम पूरा किया था । वनस्पतियाँ अनेक प्रकार के पुष्पों की वर्षा कर रही थी तथा सुन्दर रूपवती अप्सराएँ उच्च स्वर से गान-गाकर नृत्य करने में संलग्न थी । उस विवाह -महोत्सव में लोक पितामह चतुर्मुख ब्रह्मा जी स्वंय ब्राह्मण के स्थान पर विराजमान थे । उन्होंने प्रसन्न होकर उमा से कहा- ‘ पुत्री ! संसार में तुम जैसी पत्नी और शंकर-सरीखे पति सबको सुलभ हों ।’ भगवान शंकर औऱ भगवती उमा दोनों एक साथ बैठे थे । उनसे इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी अपने धामको लौट आये ।

       भगवान वराह कहते है– पृथ्वी ! रुद्र का प्राकट्य, गौरी का जन्म तथा विवाह  यह सारा प्रसंग राजा प्रजापाल के पूछने पर परम् तपस्वी महातपा ऋषि ने उन्हें जैसे सुनाया था, वह सम्पूर्ण बृतान्त मैंने तुम्हें बता दिया । देवी गौरी के जन्म, विवाह आदि-सभी कार्य तृतीया तिथि को ही सम्पन हुए थे, अतएव तृतीया उनकी तिथि मानी जाती हैं । उस तिथि को नमक खाना सर्वथा निषिद्ध है । जो स्त्री उस दिन उपवास करती हैं, उसे अचल सौभाग्य की प्राप्ति होती हैं । दुर्भाग्य ग्रस्त स्त्री या पुरुष तृतीया तिथि को लवण के परित्याग पूर्वक इस प्रसंग का श्रवण करे तो उसको सौभाग्य, धन-सम्पति औऱ मनोवांछित पदार्थो की प्राप्ति होती हैं, उसे जगत में उतम स्वास्थ्य, कान्ति औऱ पुष्टि का भी लाभ होता है ।
            ☺॥ ॐ नमोनमः हर हर शिवशम्भु-पार्वती जी ॥

                             । प्रसंग दो समाप्त ।

क्रमशः – ✍ भाग – 16

महाकाली हृदय स्तोत्र 

श्री महाकाली हृदय स्तोत्रम 

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श्री भगवती महाकाली हृदय स्तोत्र का पाठ आप पूजन मे भगवती का आवाहन करते समय अपने हृदय चक्र पर मा का ध्यान करते हुये पढे .. पुजन के अतिरिक्त इतर समय मे कभी भी पढ सकते है .. अनाहत चक्र मे स्पंदन अनुभुत होंगे .. 
॥ श्रीकालिकाहृदयम् ॥
 ॐ अस्य श्रीदक्षिणकाल्या हृदयस्तोत्रमन्त्रस्य 

श्रीमहाकाल ऋषिः । उष्णिक्छन्दः ।

 श्रीदक्षिणकालिका देवता । 

क्रीं बीजं । ह्रीं शक्तिः । नमः कीलकं । 

सर्वत्र सर्वदा जपे विनियोगः 
॥ अथ हृदयादिन्यासः । 

ॐ क्रां हृदयाय नमः । 

ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा । 

ॐ क्रूं शिखायै वषट् । 

ॐ क्रैं कवचाय हुं । 

ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।

 ॐ क्रः अस्त्राय फट् ॥ 

इति हृदयादिन्यासः
 ॥ अथ ध्यानम् । 

ॐ ध्यायेत्कालीं महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणीम् । 

चतुर्भुजां ललजिह्वां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ १॥
 नीलोत्पलदलप्रख्यां शत्रुसङ्घविदारिणीम् । 

नरमुण्डं तथा खङ्गं कमलं वरदं तथा ॥ २॥ 
बिभ्राणां रक्तवदनां दंष्ट्रालीं घोररूपिणीम् । 

अट्टाट्टहासनिरतां सर्वदा च दिगम्बराम् ॥ ३॥ 
शवासनस्थितां देवीं मुण्डमालाविभूषिताम् । 

इति ध्यात्वा महादेवीं ततस्तु हृदयं पठेत् ॥ ४॥ 
ॐ कालिका घोररूपाढया सर्वकामफलप्रदा । 

सर्वदेवस्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु मे ॥ ५॥ 
ह्रींह्रींस्वरूपिणी श्रेष्ठा त्रिषु लोकेषु दुर्लभा ।

 तव स्नेहान्मया ख्यातं न देयं यस्य कस्यचित् ॥ ६॥ 
अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि निशामय परात्मिके । 

यस्य विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तो भविष्यति ॥ ७॥
 नागयज्ञोपवीताञ्च चन्द्रार्द्धकृतशेखराम् । 

जटाजूटाञ्च सञ्चिन्त्य महाकालसमीपगाम् ॥ ८॥ 
एवं न्यासादयः सर्वे ये प्रकुर्वन्ति मानवाः । 

प्राप्नुवन्ति च ते मोक्षं सत्यं सत्यं वरानने ॥ ९॥ 
यन्त्रं श्रृणु परं देव्याः सर्वार्थसिद्धिदायकम् । 

गोप्यं गोप्यतरं गोप्यं गोप्यं गोप्यतरं महत् ॥ १०॥ 
त्रिकोणं पञ्चकं चाष्टकमलं भूपुरान्वितम् । 

मुण्डपङ्क्तिं च ज्वालां च कालीयन्त्रं सुसिद्धिदम् ॥ ११॥ 
मन्त्रं तु पूर्वकथितं धारयस्व सदा प्रिये । 

देव्या दक्षिणकाल्यास्तु नाममालां निशामय ॥ १२॥ 
काली दक्षिणकाली च कृष्णरूपा परात्मिका ।

 मुण्डमाला विशालाक्षी सृष्टिसंहारकारिका ॥ १३ ॥ 
स्थितिरूपा महामाया योगनिद्रा भगात्मिका । 

भगसर्पिःपानरता भगोद्योता भगाङ्गजा ॥ १४ ॥ 
आद्या सदा नवा घोरा महातेजाः करालिका । 

प्रेतवाहा सिद्धिलक्ष्मीरनिरुद्धा सरस्वती ॥ १५॥ 
एतानि नाममाल्यानि ये पठन्ति दिने दिने । 

तेषां दासस्य दासोऽहं सत्यं सत्यं महेश्वरि ॥ १६॥ 
ॐ कालीं कालहरां देवी कङ्कालबीजरूपिणीम् । 

कालरूपां कलातीतां कालिकां दक्षिणां भजे ॥ १७॥
 कुण्डगोलप्रियां देवीं खयम्भूकुसुमे रताम् ।

 रतिप्रियां महारौद्रीं कालिकां प्रणमाम्यहम् ॥ १८॥ 
दूतीप्रियां महादूतीं दूतीयोगेश्वरीं पराम् । 

दूतोयोगोद्भवरतां दूतीरूपां नमाम्यहम् ॥ १९॥ 
क्रींमन्त्रेण जलं जप्त्वा सप्तधा सेचनेन तु । 

सर्वे रोगा विनश्यन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ २०॥
 क्रींस्वाहान्तैर्महामन्त्रैश्चन्दनं साधयेत्ततः । 

तिलकं क्रियते प्राज्ञैर्लोको वश्यो भवेत्सदा ॥ २१॥ 
क्रीं हूं ह्रीं मन्त्रजप्तैश्च ह्यक्षतैः सप्तभिः प्रिये । 

महाभयविनाशश्च जायते नात्र संशयः ॥ २२॥ 
क्रीं ह्रीं ह्रूं स्वाहा मन्त्रेण श्मशानाग्निं च मन्त्रयेत् ।

 शत्रोर्गृहे प्रतिक्षिप्त्वा शत्रोर्मृत्युर्भविष्यति ॥ २३॥ 
ह्रूं ह्रीं क्रीं चैव उच्चाटे पुष्पं संशोध्य सप्तधा । 

रिपूणां चैव चोच्चाटं नयत्येव न संशयः ॥ २४॥ 
आकर्षणे च क्रीं क्रीं क्रीं जप्त्वाऽक्षतान् प्रतिक्षिपेत् । सहस्रयोजनस्था च शीघ्रमागच्छति प्रिये ॥ २५॥ 
क्रीं क्रीं क्रीं ह्रूं ह्रूं ह्रीं ह्रीं च कज्जलं शोधितं तथा ।

 तिलकेन जगन्मोहः सप्तधा मन्त्रमाचरेत् ॥ २६॥
 हृदयं परमेशानि सर्वपापहरं परम् । 

अश्वमेधादियज्ञानां कोटिकोटिगुणोत्तरम् ॥ २७॥
 कन्यादानादिदानानां कोटिकोटिगुणं फलम् । दूतीयागादियागानां कोटिकोटिफलं स्मृतम् ॥ २८॥
 गङ्गादिसर्वतीर्थानां फलं कोटिगुणं स्मृतम् ।

 एकधा पाठमात्रेण सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ २९॥
 कौमारीस्वेष्टरूपेण पूजां कृत्वा विधानतः । 

पठेत्स्तोत्रं महेशानि जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ ३०॥ 
रजस्वलाभगं दृष्ट्वा पठेदेकाग्रमानसः ।

 लभते परमं स्थानं देवीलोके वरानने ॥ ३१॥ 
महादुःखे महारोगे महासङ्कटके दिने । 

महाभये महाघोरे पठेतस्तोत्रं महोत्तमम् । 

सत्यं सत्यं पुनः सत्यं गोपायेन्मातृजारवत् ॥ ३२॥
 इति श्रीकालीह ॥

कहानी 22

(((( भक्त के वश में है भगवान् ))))

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किसी समय एक गांव में भागवत कथा का आयोजन किया गया, 

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एक पंडित जी भागवत कथा सुनाने आए। पूरे सप्ताह कथा वाचन चला। 

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पूर्णाहुति पर दान दक्षिणा की सामग्री इक्ट्ठा कर घोड़े पर बैठकर पंडितजी रवाना होने लगे। 

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उसी गांव में एक सीधा-सदा गरीब किसान भी रहता था जिसका नाम था धन्ना जाट। 

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धन्ना जाट ने उनके पांव पकड़ लिए। वह बोला- पंडितजी महाराज ! आपने कहा था कि जो ठाकुरजी की सेवा करता है उसका बेड़ा पार हो जाता है।

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आप तो जा रहे है। मेरे पास न तो ठाकुरजी है, न ही मैं उनकी सेवा पूजा की विधि जानता हूं। इसलिए आप मुझे ठाकुरजी देकर पधारें।

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पंडित जी ने कहा- चौधरी, तुम्हीं ले आना।

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धन्ना जाट ने कहा – मैंने तो कभी ठाकुर जी देखे नहीं, लाऊंगा कैसे ?

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पंडित जी को घर जाने की जल्दी थी। उन्होंने पिण्ड छुडाने को अपना भंग घोटने का सिलबट्टा उसे दिया और बोले- ये ठाकुरजी है। इनकी सेवा पूजा करना।

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धन्ना जाट ने कहा – महाराज में सेवा पूजा का तरीका भी नहीं जानता। आप ही बताएं।

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पंडित जी ने कहा – पहले खुद नहाना फिर ठाकुरजी को नहलाना। इन्हें भोग चढ़ाकर फिर खाना।

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इतना कहकर पंडित जी ने घोड़े के एड़ लगाई व चल दिए।

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धन्ना सीधा एवं सरल आदमी था। पंडितजी के कहे अनुसार सिलबट्टे को बतौर ठाकुरजी अपने घर में स्थापित कर दिया। 

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दूसरे दिन स्वयं स्नान कर सिलबट्टे रूप ठाकुरजी को नहलाया। 

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विधवा मां का बेटा था। खेती भी ज्यादा नहीं थी। इसलिए भोग मैं अपने हिस्से का बाजरे का टिक्कड एवं मिर्च की चटनी रख दी। 

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ठाकुरजी से धन्ना ने कहा :- पहले आप भोग लगाओ फिर मैं खाऊंगा। 

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जब ठाकुरजी ने भोग नहीं लगाया तो बोला- पंडित जी तो धनवान थे। खीर- पूड़ी एवं मोहन भोग लगाते थे। 

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मैं तो गरीब जाट का बेटा हूं, इसलिए मेरी रोटी चटनी का भोग आप कैसे लगाएंगे ? 

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पर साफ-साफ सुन लो मेरे पास तो यही भोग है। खीर पूड़ी मेरे बस की नहीं है।

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ठाकुरजी ने भोग नहीं लगाया तो धन्ना भी सारा दिन भूखा रहा।

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इसी तरह वह रोज का एक बाजरे का ताजा टिक्कड एवं मिर्च की चटनी रख देता एवं भोग लगाने की अरजी करता।

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ठाकुरजी तो पसीज ही नहीं रहे थे। यह क्रम निरंतर छह दिन तक चलता रहा। 

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छठे दिन धन्ना बोला-ठाकुरजी, चटनी रोटी खाते क्यों शर्माते हो ? आप कहो तो मैं आंखें मूंद लू फिर खा लो। 

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ठाकुरजी ने फिर भी भोग नहीं लगाया तो नहीं लगाया। धन्ना भी भूखा प्यासा था। 

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सातवें दिन धन्ना जट बुद्धि पर उतर आया। फूट-फूट कर रोने लगा एवं कहने लगा कि सुना था आप दीन-दयालु हो, पर आप भी गरीब की कहां सुनते हो,

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मेरा रखा यह टिककड एवं चटनी आकर नहीं खाते हो तो मत खाओ। अब मुझे भी नहीं जीना है, 

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इतना कह उसने सिलबट्टा उठाया और सिर फोड़ने को तैयार हुआ,

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अचानक सिलबट्टे से एक प्रकाश पुंज प्रकट हुआ एवं धन्ना का हाथ पकड़ कहा – देख धन्ना मैं तेरा चटनी टिकडा खा रहा हूं।

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ठाकुरजी बाजरे का टिक्कड एवं मिर्च की चटनी मजे से खा रहे थे। 

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जब आधा टिक्कड खा लिया तो धन्ना बोला- क्या ठाकुरजी मेरा पूरा टिक्कड खा जाओगे ? 

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मैं भी छह दिन से भूखा प्यासा हूं। आधा टिक्कड तो मेरे लिए भी रखो।

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ठाकुरजी ने कहा – तुम्हारी चटनी रोटी बड़ी मीठी लग रही है तू दूसरी खा लेना। 

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धन्ना ने कहा – प्रभु ! मां मुझे एक ही रोटी देती है। यदि मैं दूसरी लूंगा तो मां भूखी रह जाएगी।

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प्रभु ने कहा-फिर ज्यादा क्यों नहीं बनाता।

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धन्ना ने कहा – खेत छोटा सा है और मैं अकेला।

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ठाकुरजी ने कहा – नौकर रख ले।

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धन्ना बोला-प्रभु, मेरे पास बैल थोड़े ही हैं मैं तो खुद जुतता हूं।

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ठाकुरजी ने कहा-और खेत जोत ले।

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धन्ना ने कहा-प्रभु, आप तो मेरी मजाक उड़ा रहे हो। नौकर रखने की हैसियत हो तो दो वक्त रोटी ही न खा लें हम मां-बेटे।

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इस पर ठाकुरजी ने कहा – चिन्ता मत कर मैं तेरी सहायता करूंगा।

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कहते है तबसे ठाकुरजी ने धन्ना का साथी बनकर उसकी सहायता करनी शुरू की। 

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धन्ना के साथ खेत में कामकाज कर उसे अच्छी जमीन एवं बैलों की जोड़ी दिलवा दी।

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कुछे अर्से बाद घर में गाय भी आ गई। मकान भी पक्का बन गया। 

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सवारी के लिए घोड़ा आ गया। धन्ना एक अच्छा खासा जमींदार बन गया। 

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कई साल बाद पंडितजी पुनः धन्ना के गांव भागवत कथा करने आए। 

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धन्ना भी उनके दर्शन को गया। प्रणाम कर बोला- पंडितजी, आप जो ठाकुरजी देकर गए थे वे छह दिन तो भूखे प्यासे रहे एवं मुझे भी  भूखा प्यासा रखा। 

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सातवें दिन उन्होंने भूख के मारे परेशान होकर मुझ गरीब की रोटी खा ही ली।

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उनकी इतनी कृपा है कि खेत में मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर काम में मदद करते है।

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अब तो घर में गाय भी है। सात दिन का घी-दूध का ‘सीधा‘ यानी बंदी का घी- दूध मैं ही भेजूंगा। 

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पंडितजी ने सोचा मूर्ख आदमी है। मैं तो भांग घोटने का सिलबट्टा देकर गया था।

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गांव में पूछने पर लोगों ने बताया कि चमत्कार तो हुआ है। धन्ना अब वह गरीब नहीं रहा। जमींदार बन गया है। 

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दूसरे दिन पंडितजी ने धन्ना से कहा-कल कथा सुनने आओ तो अपने साथ अपने उस साथी को ले कर आना जो तुम्हारे साथ खेत में काम करता है।

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घर आकर धन्ना ने प्रभु से निवेदन किया कि कथा में चलो तो प्रभु ने कहा – मैं नहीं चलता तुम जाओ।

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धन्ना बोला – तब क्या उन पंडितजी को आपसे मिलाने घर ले आऊ।

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प्रभु ने कहा – बिल्कुल नहीं।  मैं झूठी कथा कहने वालों से नहीं मिलता। 

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जो मुझसे सच्चा प्रेम करता है और जो अपना काम मेरी पूजा समझ करता है मैं उसी के साथ रहता हूं।

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 ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

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धूमावती साधना

तांत्रोत्क धूमावती मंत्र साधना.
धूम्रा मतिव सतिव पूर्णात सा सायुग्मे |

सौभाग्यदात्री सदैव करुणामयि: ||
“हे आदि शक्ति धूम्र रूपा माँ धूमावती आप पूर्णता के साथ सुमेधा और सत्य के युग्म मार्ग द्वारा साधक को सौभाग्य का दान करके सर्वदा अपनी असीम करुणा और ममता का परिचय देती हो….

आपके श्री चरणों में मेरा नमस्कार है |”
“धूम्रासपर्या कल्प पद्धति” से उद्धृत इस श्लोक से ही माँ धूमावती की असीमता और विराटता को हम सहज ही समझ

सकते हैं | बहुधा साधक जब जिज्ञासु की अवस्था में होता है तब वो भ्रांतियों का शिकार होता है,अब ऐसे में या तो वो मार्ग से भटककर पतित हो जाता है,या फिर सद्गुरु के श्री चरण कमलों का आश्रय लेकर सत्य से ना सिर्फ परिचित हो जाता है अपितु उस पर निर्बाध गति करते हुए अपने अभीष्ट लक्ष्य को भी प्राप्त कर लेता है | माँ धूमावती की साधना को जटिल और अहितकर या विनाशकारी क्यूँ मानते हैं” ?

माँ का कोई भी रूप अहितकर होता ही नहीं है ,महोदधि तन्त्र मैं कहा जाता है की देवी धूमावती महा विधा हर प्रकार की दरिद्रता नाश के लिए ,तन्त्र मंत्र , जादू टोना , बुरी नजर , भुत,प्रेत , सभी का समन के लिए भय से मुक्ति के लिए , सभी रोग शोक समाप्ति के लिए , अभय प्राप्ति के लिए , जीवन की सुरक्षा के लिए , तंत्र बांधा मुक्ति , शत्रु को जाड मूल से समाप्त करने के लिए धूमावती साधना वरदान है कलयुग में देवी धूमावती के बारे मैं कहा जाता है , यह जन्म से ले कर मृत्यु तक साधक की देख भाल करने वाली सातम महाविधा है , वेदों के काल की विवेचना से पता चलता है की महा प्रलय काल के समय ये मैजूद रहती है उन का रंग महा

प्रलय काल के बदलो जेसा ही है ,जब ब्रम्हांड की उम्र ख़त्म हो जाती है , काल समाप्त हो जाता है तो और स्वय महाकाल शिव भी अंतर्ध्यान हो जाते है ,तब भी माँ धूमावती आकेली खाड़ी रहती है,और

काल अन्तरिक्ष से परे काल की शक्ति को जताती है | उस समय न तो धरती, न ही सूरज , चाँद , सितारे , रहते है , रहता है .तो सिर्फ धुआं और राख, – वही चार्म ज्ञान है |, निराकार – न अच्छा , न बुरा , न शुद्ध , न अशुद्ध , न शुभ , न ही अशुभ धुएं के रूप में अकेली माँ धूमावती रह जाती है है , सभी उन का साथ छोड़ जाते है , एस लिए अल्प जानकारी रखने वाले , अशुभ मानते है l 

धूमावती रहस्य तंत्र

यही उन का रहस्य है की वो वास्तविकता को दिखाती है , सदेव कडवी ,रुखी होती है है , एस लिए अशुभ लगती है , आपने साधको को सांसरिक बन्धनों ,से आजाद करती है , सांसरिक मोह माया से मुक्ति

विरक्ति दिलाती है , जिस से यह विरक्ति का भाव उन के साधको को अन्य लोगो से अलग थलग रखता है ,एकांत वश करने को प्रेरित करती है’, महाविद्याओं का कोई भी रूप…फिर वो चाहे महाकाली हों,तारा हों या कमला हों…अपने आप में पूर्ण होता है | ये सभी उसी परा शक्ति आद्यशक्ति के ही तो विभिन्न रूप हैं,जब वो स्वयं अपनी कल्पना मात्र से इस सृष्टि का सृजन,पालन और संहार कर सकती हैं तो उसी परम पूर्ण के ये महाविद्या रुपी रूप कैसे अपूर्ण होंगे | इनमे भी तो निश्चित ही वही विशिष्टता होंगी ही ना |”

महाविद्याओं के पृथक पृथक १० रूपों को उनके जिन गुणों के कारण पूजा जाता है ,वास्तव में वो उन्हें सामान्य ना होने देने की गुप्तता ही है,जो पुरातन काल से सिद्धों और साधकों की परंपरा में चलती चली आई है | जब कोई साधक गुरु के संरक्षण में पूर्ण समर्पण के साथ साधना के लिए जाता है तो परीक्षा के बाद उसे इन शक्तियों की ब्रह्माण्डीयता से परिचित कराया जाता है और तब सभी कुंजियाँ उसके हाथ में सौंप दी जाती हैं और तभी उसे ज्ञात होता है की सभी महाविद्याएं सर्व गुणों से परिपूर्ण है और वे अपने साधक को सब कुछ देने का सामर्थ्य रखती हैं अर्थात यदि माँ कमला धन प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में साध्य हैं तो उनके कई गोपनीय रूप शत्रु मर्दन और ज्ञान से आपूरित करने वाले भी हैं | अब ये तो गुरु पर निर्भर करता है की वो कब इन तथ्यों को अपने शिष्य को सौंपता है और ये शिष्य पर है की वो अपने समर्पण से कैसे सद्गुरु के ह्रदय

को जीतकर उनसे इन कुंजियों को प्राप्त करता है |

वास्तव में सत,रज और तम गुणों से युक्त ध्यान, दिशा, वस्त्र, काल और विधि पर ही उस शक्तियों के गुण परिवर्तन की क्रिया आधारित होती है | किसी भी महाविद्या को पूर्ण रूप से सिद्ध कर लेने के लिए साधक को एक अलग ही जीवन चर्या,आहार विहार और खान-पान का आश्रय लेना पड़ता है….किन्तु जहाँ मात्र उनकी कृपा प्राप्त करनी हो तो ये नियम थोड़े सरल हो जाते हैं और ये हम सब जानते हैं की विगलित कंठ से माँ को पुकारने पर वो आती ही हैं |

माँ धूमावती के साथ भी ऐसा ही है,जन सामान्य या सामान्य साधक उन्हें मात्र अलक्ष्मी और विनाश की देवी ही मानते हैं | किन्तु जिनकी प्रज्ञा का जागरण हुआ हो वो जानते हैं की आखिर इस महाविद्या का बाह्य परिवेश यदि इतना वृद्ध बनाया गया है तो क्या वो वृद्ध दादी या नानी माँ का परिवेश उन्ही वात्सल्यता से युक्त ना होगा | धूमावती सौभाग्यदात्री कल्प एक ऐसा ही प्रयोग है जिसे मात्र धूमावती दिवस,जयंती या किसी भी रविवार को एक दिन करने पर ही ना सिर्फ जीवन में पूर्ण अनुकूलता प्राप्त हो जाती है अपितु. .शत्रुओं से मुक्ति,आर्थिक उन्नति,कार्य क्षेत्र में सफलता, प्रभावकारी व्यक्तित्व और

कुण्डलिनी जागरण जैसे लाभ भी प्राप्त होते हैं |

विनाश और संहार के कथनों से परे ये गुण भी हम इन्ही की साधना से स्पष्ट रूप से देख सकते हैं | ये साधना रात्री में ही १० बजे के बाद की जाती है | स्नान कर बगैर तौलिए से शरीर पोछे ९ या तो वैसे ही शरीर को सुखा लिया जाये या धोती के ऊपर धारण किये जाने वाले अंग वस्त्र से हलके हल्के शरीर सुखा लिया जाये और साधना के निमित्त सफ़ेद वस्त्र या बहुत हल्का पीला वस्त्र धारण कर लिया

जाये | ऊपर का अंगवस्त्र भी सफ़ेद या हल्का पीला ही होगा..धोती और अंगवस्त्र के अतिरिक्त कोई अंतर्वस्त्र प्रयोग नहीं किया जाये | साधक-साधिका दोनों के लिए यही नियम है,महिला ऊपर साडी के रंग का ही ब्लाउज पहन सकती हैं | आसन

सफ़ेद होगा.. दिशा दक्षिण होगी | गुरु व गणपति पूजन के बाद एक पृथक बाजोट पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर एक लोहे या स्टील के पात्र में “धूं” का अंकन काजल से करके उसके ऊपर एक सुपारी स्थापित कर दी जाए और हाथ जोड़कर निम्न ध्यान मंत्र का ११ बार उच्चारण करे –
धूम्रा मतिव सतिव पूर्णात सा सायुग्मे |

सौभाग्यदात्री सदैव करुणामयि: ||
इसके बाद उस सुपारी को माँ धूमावती का रूप मानते हुए,अक्षत,काजल,भस्म,काली मिर्च और तेल के दीपक से और उबाली हुयी उडद और फल का नैवेद्य द्वारा

उनका पूजन करे, तत्पश्चात उस पात्र के दाहिने अर्थात अपने बायीं और एक मिटटी या लोहे का छोटा पात्र स्थापित कर उसमे सफ़ेद तिलों की ढेरी बनाकर उसके ऊपर एक दूसरी सुपारी स्थापित करे,और

निम्न ध्यान मंत्र का ५ बार उच्चारण करते हुए माँ धूमावती के भैरव अघोर रूद्र का ध्यान करे –
त्रिपाद हस्त नयनं नीलांजनं चयोपमं,

शूलासि सूची हस्तं च घोर दंष्ट्राटट् हासिनम् ||
और उस सुपारी का पूजन,तिल,अक्षत,धूप-दीप तथा गुड़ से करे तथा काले तिल डालते हुए ‘ॐ अघोर रुद्राय नमः’ मंत्र का २१ बार उच्चारण करे | इसके बाद बाए

हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से निम्न मंत्र का ५ बार उच्चारण करते हुए पूरे शरीर पर छिडके –
धूमावती मुखं पातु धूं धूं स्वाहास्वरूपिणी |

ललाटे विजया पातु मालिनी नित्यसुन्दरी ||

कल्याणी ह्रदयपातु हसरीं नाभि देशके |

सर्वांग पातु देवेशी निष्कला भगमालिना ||

सुपुण्यं कवचं दिव्यं यः पठेदभक्ति संयुतः |

सौभाग्यमयतं प्राप्य जाते देवितुरं ययौ ||
इसके बाद जिस थाली में माँ धूमावती की स्थापना की थी,उस सुपारी को अक्षत और काली मिर्च मिलकर निम्न मंत्र की आवृत्ति ११ बार कीजिये अर्थात क्रम से हर मंत्र ११-११ बार बोलते हुए अक्षत मिश्रित काली मिर्च डालते रहे |
ॐ भद्रकाल्यै नमः

ॐ महाकाल्यै नमः

ॐ डमरूवाद्यकारिणीदेव्यै नमः

ॐ स्फारितनयनादेव्यै नमः

ॐ कटंकितहासिन्यै नमः

ॐ धूमावत्यै नमः

ॐ जगतकर्त्री नमः

ॐ शूर्पहस्तायै नमः
इसके बाद निम्न मंत्र का जप रुद्राक्ष माला से २१,५१ , १२५ माला करें, यथासंभव एक बार में ही ये जप हो सके तो अतिउत्तम,अब मंत्र जाप प्रारंभ करे.
मंत्र:-
ॐ धूं धूं धूमावत्यै फट् ||
OM DHOOM DHOOM DHOOMAVATYAI PHAT ||
मंत्र जप के बाद मिटटी या लोहे के हवन कुंड में लकड़ी जलाकर १०८ बार घी व काली मिर्च के द्वारा आहुति डाल दें | आहुति के दौरान ही आपको आपके आस पास एक तीव्रता का अनुभव हो सकता है

और पूर्णाहुति के साथ अचानक मानो सब कुछ शांत हो जाता है…

इसके बाद आप पुनः स्नान कर ही सोने के लिए जाए और दुसरे दिन सुबह आप सभी सामग्री को बाजोट पर बीछे वस्त्र के साथ ही विसर्जित कर दें और जप माला को कम से कम २४ घंटे नमक मिश्रित जल में डुबाकर रखे और फिर साफ़ जल से धोकर और उसका पूजन कर अन्य कार्यों में प्रयोग करें | इस प्रयोग को करने पर स्वयं ही अनुभव हो जाएगा की आपने किया क्या है,कैसे परिस्थितियाँ आपके अनुकूल हो जाती है ये तो स्वयं अनुभव करने वाली

बात है….
देवी धूमावती को आज तक कोई योद्धा युद्ध में नहीं परास्त कर पाया, तभी देवी का कोई संगी नही है